ऋषिता गंगराडे़

भारत में शिक्षा संस्थानों का उद्देश्य बच्चों और युवाओं को बेहतर भविष्य के लिए तैयार करना है, लेकिन जब उन्हीं संस्थानों के भोजन से उनकी सेहत पर संकट मंडराने लगे, तो सवाल उठना लाज़मी है। देशभर के स्कूलों, कॉलेजों, होस्टलों और भोज्यालयों (मेस/कैंटीन) में लगातार मिल रही फूड प्वाइज़निंग की खबरें यह संकेत दे रही हैं कि खाने की गुणवत्ता पर ध्यान देना अब एक प्राथमिक आवश्यकता बन चुका है।

मिड-डे मील: पोषण या ज़हर?

मिड-डे मील योजना को छात्रों को स्कूलों में बनाए रखने और उनके पोषण स्तर को सुधारने के लिए शुरू किया गया था। लेकिन 2009 से 2022 के बीच लगभग 9,646 बच्चे इस योजना के तहत दिए गए खाने से बीमार हो चुके हैं।

2022 में ही 979 बच्चों ने फूड प्वाइज़निंग की शिकायत की — जो छह सालों में सबसे अधिक था। इनमें से कई मामलों में भोजन में छिपकली, कॉकरोच, मरा हुआ सांप या चूहा तक पाया गया।बिहार के सारण जिले में 2013 में जहरीले तेल से बना खाना खाने के बाद 23 से अधिक बच्चों की मौत हो गई थी, जो आज भी मिड-डे मील योजना की सबसे भयावह घटनाओं में गिनी जाती है।

कॉलेज और होस्टल: उच्च शिक्षा के नाम पर ज़हरीला खाना

स्कूलों के साथ ही अब कॉलेजों और यूनिवर्सिटी होस्टलों में भी फूड प्वाइज़निंग की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं।

उदाहरण:

  • MSU, वडोदरा (जुलाई 2025): विश्वविद्यालय के SD हॉल होस्टल में खाना खाने के बाद 100 से अधिक छात्राएँ बीमार पड़ीं। उल्टी, दस्त और बुखार जैसी गंभीर शिकायतों के बाद मामला नगर निगम और मीडिया में पहुंचा।
  • Ravenshaw University, कटक: 46 छात्र फूड प्वाइज़निंग से पीड़ित हुए और सरकार को मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा।
  • Andhra University: छात्रों ने खाना में कीड़े और गंदगी पाए जाने पर विरोध प्रदर्शन किया।

इन घटनाओं से यह साफ है कि कई संस्थानों में बिना लाइसेंस के मेस और कैंटीन चलाई जा रही हैं, जहां न तो स्वच्छता का ध्यान रखा जाता है और न ही प्रशासनिक निगरानी की कोई व्यवस्था है।

छात्रों की आवाज़: सोशल मीडिया पर

IITs और NITs जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में पढ़ने वाले छात्र भी अब फूड प्वाइज़निंग के शिकार हो रहे हैं।

Reddit और अन्य प्लेटफ़ॉर्म्स पर छात्र रोजाना शिकायतें डाल रहे हैं:

  • IIT Hyderabad: टाइफॉयड और फूड प्वाइज़निंग के लगातार मामलों के बावजूद कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
  • IIT Patna और Palakkad: कीड़े, फंगस और यहां तक कि मेंढक तक खाना में पाए गए।
  • MITS ग्वालियर और SPPU पुणे: भोजन में मक्खियाँ, कीड़े और ताज़गी की पूरी तरह से कमी।

छात्रों के अनुसार, शिकायत करने पर अक्सर प्रशासन दोष टालता है, ठेकेदार को मामूली फाइन लगाकर मामला रफा-दफा कर दिया जाता है।

सरकारी लापरवाही और निरीक्षण की कमी

FSSAI और स्वास्थ्य विभाग के नियमों के बावजूद ज्यादातर शैक्षणिक संस्थानों में नियमित निरीक्षण नहीं किया जाता। न तो खाने के नमूनों की जांच होती है, न ही मेस स्टाफ को प्रशिक्षित किया जाता है।

क्या किया जाना चाहिए?

  1. हर शैक्षणिक संस्थान में भोजन निरीक्षण समिति बनाई जाए।
  2. सभी मेस और कैंटीन को FSSAI लाइसेंस अनिवार्य रूप से लेना चाहिए।छात्रों को शिकायत दर्ज करने के लिए स्वतंत्र हेल्पलाइन और पोर्टल मुहैया कराया जाए।
  3. दोषी ठेकेदारों को केवल फाइन नहीं, बल्कि ब्लैकलिस्ट किया जाना चाहिए।
  4. मीडिया, अभिभावक और सामाजिक संगठन इस विषय पर लगातार निगरानी रखें।

शिक्षा के मंदिरों में अगर परोसा जा रहा भोजन ही ज़हर बन जाए, तो यह हमारे पूरे सिस्टम पर सवाल खड़ा करता है। समय आ गया है जब हम बच्चों और युवाओं की सेहत के मुद्दे को गंभीरता से लें और शिक्षण संस्थानों में भोजन की गुणवत्ता को सर्वोच्च प्राथमिकता दें।

Sources:-

  • The Hindu Times
  • Integrated Disease Surveillance Programme (IDSP) Reports
  • FSSAI Guidelines and Roles (official)
  • IIT Hyderabad टाइफॉयड और फूड पॉइज़निंग

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