ऋषिता गंगराडे़

नई दिल्ली/हरियाणा:

डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख और बलात्कार व हत्या जैसे गंभीर मामलों में सजा काट रहे गुरमीत राम रहीम सिंह उर्फ़ ‘बाबा राम रहीम’ को लेकर देश भर में एक बार फिर बहस छिड़ गई है। जब एक आम आदमी या बच्चा किसी मंदिर में दिया गया प्रसाद लेने से इनकार करता है, और कारण पूछने पर कहता है — “हम बाबा के भक्ति वाले प्रसाद नहीं खाते,” — तो यह हमारे समाज में फैले अंधभक्ति, पाखंड और धोखे की गहरी जड़ें दिखाता है।

बाबा राम रहीम:

संत या अपराधी?राम रहीम का नाम एक ऐसे बाबा के रूप में सामने आया, जिसने लाखों अनुयायियों को अपनी “धार्मिक शक्ति” और “सेवा भाव” के नाम पर मोहित किया। लेकिन 2017 में पंचकूला की विशेष सीबीआई अदालत ने राम रहीम को दो साध्वियों के बलात्कार के मामले में दोषी ठहराया और 20 साल की सजा सुनाई।

गंभीर आरोप और सजाएं:

  • बलात्कार के दो मामलों में दोषी
  • पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या में दोषी
  • दो साधुओं को नपुंसक बनाए जाने का मामला
  • जेल से “पैरोल पर रिहाई” और लगातार ऑनलाइन प्रवचन के जरिए भक्तों को भटकाने की कोशिश

भक्तों की अंधश्रद्धा और सामाजिक प्रभाव

राम रहीम के भक्तों की संख्या लाखों में है, जिनमें से कई आज भी आंख मूंदकर उनकी पूजा करते हैं। लेकिन अब समाज के एक तबके में यह विचार घर कर गया है कि ऐसे तथाकथित बाबाओं के प्रसाद, उपदेश और वस्तुएँ ग्रहण करना ‘पाप’ जैसा है।

एक माता-पिता की चिंता:

भोपाल की निवासी ममता शर्मा बताती हैं, “मेरे बेटे ने स्कूल में किसी दोस्त से प्रसाद नहीं लिया क्योंकि वो ‘राम रहीम भक्त’ का बताया गया। बच्चा कहता है – ऐसे लोगों से कुछ भी नहीं लेना चाहिए। ये सोच हमारे बच्चों में डर और घृणा की भावना भर रही है।”

धार्मिक आस्था बनाम अंधभक्ति

भारत में धर्म को लेकर गहरी आस्था है, लेकिन जब यह आस्था तथाकथित गुरुओं के इशारों पर आंख मूंदकर चलती है, तब यह अंधभक्ति बन जाती है। समाज में ऐसे कई उदाहरण हैं जहां ‘बाबाओं’ ने लोगों को ठगा, उनके साथ यौन शोषण किया और राजनीतिक संरक्षण में अपराध किए।

न्याय प्रणाली का सवाल

हाल के वर्षों में राम रहीम को हर त्योहार या विशेष दिन पर “पैरोल” पर छोड़ा जाना, और फिर उसी दौरान लाखों की संख्या में प्रवचन करना, एक बड़ा सवाल खड़ा करता है — क्या हमारे कानून में ऐसे दोषियों के लिए विशेष छूट है?

सामाजिक संदेश:

यह ज़रूरी है कि हम धार्मिक आस्था को विवेक और संवेदनशीलता के साथ समझें। प्रसाद किसी धर्म या व्यक्ति से जुड़ा पवित्र भाव होता है, उसे अस्वीकार करना किसी समुदाय विशेष की भावना को ठेस पहुँचा सकता है, लेकिन साथ ही यह भी सत्य है कि अपराधी वेशधारी संतों से सतर्क रहना अब सामाजिक जिम्मेदारी बन चुकी है।

स्रोत:

  • BBC Hindi रिपोर्ट – 2017
  • NDTV रिपोर्ट – गुरमीत राम रहीम को मिली पैरोल
  • The Wire – डेरा सच्चा सौदा और सत्ताधारी दलों की निकटता

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