ऋषिता गंगराडे़

हाल ही में मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में कई नए जिलों की घोषणा की गई है। यह कदम विकास के नाम पर उठाया गया है, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या वाकई ये घोषणाएं जनहित में हैं या महज चुनावी समीकरण साधने का प्रयास?

नए जिलों की होड़:

2023 और 2024 के बीच मध्य प्रदेश सरकार ने 23 नए जिलों की घोषणा की, जिनमें मऊगंज, चाचौड़ा, नागदा, पांढुर्णा जैसे नाम प्रमुख हैं। इसी तरह उत्तर प्रदेश में भी कई जिलों के पुनर्गठन की मांग तेज हुई है। यह ट्रेंड अब चुनावी वर्षों में तेज़ होता दिख रहा है।

सरकार की दलील:

सरकार का तर्क है कि छोटे जिले बनने से प्रशासनिक सुविधा बढ़ेगी, विकास तेजी से पहुंचेगा और जनता को स्थानीय स्तर पर अधिक सुविधाएं मिलेंगी। इससे सरकारी योजनाओं का लाभ सीधा ज़मीनी स्तर पर पहुंचेगा।

हकीकत क्या है?
हालांकि, ज़मीनी सच्चाई कुछ अलग है:

  1. विकास कार्य पहले से ही ठप:
    मध्य प्रदेश में पहले से मौजूद कई जिलों में पर्याप्त संसाधन और आधारभूत ढांचे की कमी है। उदाहरण के लिए, निवाड़ी, जो 2018 में जिला बना, आज भी अधूरी स्वास्थ्य सुविधाओं, अपर्याप्त प्रशासनिक भवनों और स्टाफ की कमी से जूझ रहा है।
  2. चुनावी समय पर घोषणाएं:
    नए जिलों की घोषणाएं अक्सर चुनाव के 6-8 महीने पहले की जाती हैं। विशेषज्ञ इसे “vote bank appeasement” कहते हैं। यह देखा गया है कि जहां जातिगत या क्षेत्रीय समीकरण अहम होते हैं, वहां नए जिले घोषित किए जाते हैं।
  3. वित्तीय बोझ:
    एक नया जिला बनाने में औसतन 100 से 300 करोड़ रुपये तक का खर्च आता है — इसमें कलेक्टर ऑफिस, पुलिस मुख्यालय, न्यायालय, शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग जैसी मूलभूत संरचनाएं शामिल हैं। क्या राज्य सरकारें इस आर्थिक भार को वहन कर पा रही हैं?

विशेषज्ञों की राय:

भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के पूर्व अधिकारी श्री हरिशंकर व्यास का कहना है,

“नया जिला बनाना तभी उपयोगी होता है जब उसकी ज़रूरत वास्तविक हो और उसके लिए पहले से तैयार योजना और ढांचा मौजूद हो। वरना ये सिर्फ राजनीतिक फायदा लेने का तरीका बन जाता है।”

जनता की प्रतिक्रिया:

कुछ स्थानों पर जनता नए जिलों की घोषणा से खुश भी है, क्योंकि उन्हें उम्मीद है कि इससे रोजगार, शिक्षा और चिकित्सा सुविधाएं बढ़ेंगी। लेकिन वहीं कुछ क्षेत्रों में आंदोलन भी हुए हैं — जैसे कि उत्तर प्रदेश के अमेठी और सुल्तानपुर के कुछ हिस्सों में लोग जिला पुनर्गठन के खिलाफ प्रदर्शन कर चुके हैं।

नए जिलों की घोषणा अगर रणनीतिक रूप से और पूर्व नियोजित तरीके से की जाए तो यह वास्तव में विकास का जरिया बन सकता है। लेकिन जब ये घोषणाएं सिर्फ चुनावी लाभ, जातिगत समीकरण या राजनीतिक संतुलन साधने के लिए की जाती हैं, तब यह सवाल उठता है — क्या जनता को सिर्फ ‘जिला’ देकर बहलाया जा रहा है?

स्रोत:

  • मध्य प्रदेश शासन की वेबसाइट: mpinfo.org
  • द हिंदू, जून 2024: “New Districts and Political Calculations in MP”
  • दैनिक भास्कर, अप्रैल 2024: “नया जिला या नया बोझ?
  • “इंडिया टुडे रिपोर्ट, फरवरी 2024: “Is District Reorganization Politically Motivated?”

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