ऋषिता गंगराडे़

भारत का मानसून कभी किसानों के लिए खुशियों की सौगात लेकर आता है तो कभी तबाही का मंजर बना देता है। हाल के वर्षों में मानसून का पैटर्न काफी बदल गया है। जहां एक ओर कुछ क्षेत्रों में लगातार भारी बारिश से बाढ़ की स्थिति पैदा हो जाती है, वहीं दूसरी ओर कई राज्यों में बारिश की कमी से सूखे जैसे हालात बन जाते हैं। इस असंतुलन ने न केवल कृषि उत्पादन पर असर डाला है, बल्कि लाखों लोगों के जीवन, आजीविका और स्वास्थ्य को भी खतरे में डाल दिया है।जलवायु परिवर्तन को इस बदलते मिज़ाज का सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, बढ़ते तापमान और ग्लोबल वार्मिंग के चलते वायुमंडलीय दबाव और समुद्री तापमान में बदलाव हो रहा है, जिससे मानसून की गति और दिशा पर असर पड़ता है। परिणामस्वरूप, बारिश का समय और मात्रा दोनों अनिश्चित हो गए हैं।

बाढ़ की स्थिति में नदियाँ उफान पर आकर खेत, घर और सड़कें डुबो देती हैं, जिससे करोड़ों का आर्थिक नुकसान होता है। दूसरी ओर, सूखा प्रभावित इलाकों में किसान पानी की कमी से फसलें बचाने में असमर्थ हो जाते हैं। यह विरोधाभास न केवल खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी कमजोर कर रहा है।

सरकार और समाज को मिलकर इसके समाधान की दिशा में कदम बढ़ाने होंगे। जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन, बाढ़ प्रबंधन और सूखा-रोधी फसलों को बढ़ावा देकर इस चुनौती से निपटा जा सकता है। साथ ही, जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए कार्बन उत्सर्जन कम करना और पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देना आवश्यक है। यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में मानसून का यह असंतुलन और भी गंभीर रूप ले सकता है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि समाधान के लिए दीर्घकालिक और व्यापक रणनीति अपनाना जरूरी है। इसमें शामिल हैं—

  • वर्षा जल संचयन और छोटे-बड़े जलाशयों का निर्माण।
  • सूखा-रोधी और कम पानी में उगने वाली फसलों को बढ़ावा।
  • बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में मजबूत तटबंध और जल निकासी प्रणाली।
  • वनीकरण और पर्यावरण संरक्षण की सख्त नीतियाँ।

अगर सरकार, स्थानीय समुदाय और आम नागरिक मिलकर जल प्रबंधन और जलवायु संरक्षण की दिशा में काम करें, तो इस बदलते मानसून के खतरों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। अन्यथा, आने वाले वर्षों में बाढ़ और सूखे की मार और भी भयावह रूप ले सकती है।

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