रानू यादव: महिलाओं के खिलाफ हिंसा में चिंताजनक बढ़ोतरी होती देखी जा सकती है। इस अपराध से कोई भी राज्य अछूता नहीं है।इससे भी आश्चर्य की बात और ज्यादा भयावह यह है कि ये अपराध स्कूल व कॉलेज परिसरों या कार्यस्थलों जैसी जगहों में हो रहे हैं जो आम तौर पर सुरक्षित जगह माने जाते हैं।

बालासोर के फकीर मोहन ऑटोनॉमस कॉलेज की एक 20-वर्षीय छात्रा ने आत्मदाह के प्रयास में 90 % झुलसने के बाद 14 जुलाई को दम तोड़ दिया। इस बीएड छात्रा ने एक वरिष्ठ शिक्षक के खिलाफ कई बार यौन उत्पीड़न की शिकायत की, जिसे न सुने जाने पर उसने प्राचार्य कार्यालय के सामने यह कदम उठाया। आरोपी शिक्षक समीर साहू और प्राचार्य दिलीप घोष को गिरफ्तार कर लिया गया है, लेकिन अगर छात्रा की शिकायत का समय रहते निवारण किया गया होता तो एक बेशकीमती जिंदगी को बचाया जा सकता था। उसने नीचे से ऊपर तक फरियाद की, यहां तक कि मामले को मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंचाया, लेकिन उसकी इस गंभीर शिकायत पर किसी ने ध्यान नहीं दिया।

बंगाल में, साल 2024 में आर.जी. कर मेडिकल हॉस्पिटल में एक परास्नातक छात्रा की नृशंस हत्या को अभी एक साल भी नहीं हुए कि इसी जून में कानून की एक छात्रा के साथ परिसर में सामूहिक बलात्कार किया गया।


2012 में दिल्ली में निर्भया के बलात्कार और हत्या के बाद जमीन पर ज्यादा कुछ बदला नहीं दिखता। कठोर कानून मौजूद हैं, पर वे कितने प्रभावी हैं? ओडिशा की छात्रा की दुर्दशा ने उन आंतरिक शिकायत कमेटियों की ओर ध्यान खींचा है, जो ‘कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न अधिनियम, 2013’ के तहत अनिवार्य हैं। ओडिशा सरकार ने इस दुखद मौत के बाद सभी कॉलेजों को 24 घंटे के भीतर कमेटियों का गठन करने के लिए कहा। व्यवस्था ने जिस ढंग से इस छात्रा को निराश किया उसके बारे में, और जवाबदेही के पूर्ण अभाव के बारे में सवाल उठाये जाने चाहिए।

2022 के एक रिपोर्ट बताती है गंभीर कहानी

साल 2022 के एक रिपोर्ट के उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि ‘महिलाओं के खिलाफ अपराध’ के कुल 4,45,256 मामले दर्ज किये गये, जो साल 2021 से चार फीसदी ज्यादा थे। महिलाओं के खिलाफ अपराध का सबसे बड़ा हिस्सा ‘पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता’ (31.4 फीसदी) के तहत दर्ज हुआ, जबकि सभी अपराधों में ‘शील हनन की नीयत से महिलाओं पर हमले’ का हिस्सा 18.7 फीसदी था, और ‘बलात्कार’ 7.1 फीसदी पर रहा। यह ध्यान रखना होगा कि बहुत से अपराध बिना रिपोर्ट हुए भी रह जाते हैं। इस पृष्ठभूमि में, यौन हिंसा और जेंडर के बारे में बातचीत जरूरी है और इसकी शुरुआत जल्दी होनी चाहिए।
अब सवाल यह उठता है कि इतनी सुरक्षा और कानून के कई नियम की बावजूद ऐसे अपराध हमारे समाज में क्यों हो रहे है।

महिलाओं से जुड़े कानूनी अधिकार!
संवैधानिक अधिदेश को कायम रखने के लिए, राज्य ने समान अधिकार सुनिश्चित करने, सामाजिक भेदभाव और विभिन्न प्रकार की हिंसा और अत्याचारों का मुकाबला करने तथा विशेष रूप से कामकाजी महिलाओं को सहायता सेवा प्रदान करने के उद्देश्य से विभिन्न विधायी उपाय लागू किए हैं।

यद्यपि महिलाएं किसी भी अपराध जैसे ‘हत्या’, ‘डकैती’, ‘धोखाधड़ी’ आदि की शिकार हो सकती हैं, लेकिन जो अपराध विशेष रूप से महिलाओं के विरुद्ध होते हैं उन्हें ‘महिलाओं के विरुद्ध अपराध’ कहा जाता है। यह कानून दो श्रेणी में विभाजित है;

(1) भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के अंतर्गत चिन्हित अपराध

  • बलात्कार (धारा 376 आईपीसी)
  • विभिन्न उद्देश्यों के लिए अपहरण और व्यपहरण (धारा 363 – 373 आईपीसी)
  • दहेज के लिए हत्या, दहेज हत्या या उसके प्रयास (आईपीसी की धारा 302/304-बी)
  • मानसिक और शारीरिक दोनों तरह की यातना (आईपीसी की धारा 498-ए)
  • छेड़छाड़ (आईपीसी की धारा 354)
  • यौन उत्पीड़न (आईपीसी की धारा 509) (जिसे पहले ईव-टीजिंग कहा जाता था)
  • लड़कियों का आयात (21 वर्ष तक की आयु) (आईपीसी की धारा 366-बी)

(2)विशेष कानूनों के अंतर्गत पहचाने गए अपराध, जैसे:

  • सती प्रथा (रोकथाम) अधिनियम, 1987
  • दहेज निषेध अधिनियम, 1961
  • महिलाओं का अशिष्ट चित्रण (निषेध) अधिनियम, 1986
  • अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम, 1956


NCRB रिपोर्ट में प्रस्तुत चिंताजनक आँकड़े इस बात की याद दिलाते हैं कि भारत में महिलाओं की सुरक्षा एवं गरिमा सुनिश्चित करने के लिये अभी और प्रबल प्रयासों की आवश्यकता है।

आगे की राह के लिये सभी हितधारकों की ओर से महिलाओं के लिये सुरक्षित और अधिक अच्छी वातावरण का निर्माण करने की दिशा में मिलकर कार्य करने का संकल्प लेने की आवश्यकता है। मौजूदा कानूनों को सुदृढ़ करना, लिंग जागरूकता कार्यक्रमों को बढ़ावा देना अत्यंत महत्त्वपूर्ण कदम होंगे। भारत में महिलाओं को लक्षित करने वाले अपराधों के विरुद्ध संघर्ष के लिये समाज के सभी क्षेत्रों से निरंतर, ठोस एवं करुणापूर्ण प्रतिक्रिया की आवश्यकता है। भारत एक ऐसे भविष्य की दिशा में कार्य कर, जहाँ महिलाओं के अधिकार एवं सुरक्षा अनुल्लंघनीय हों, वास्तविक लैंगिक समानता और सामाजिक न्याय प्राप्त करने की दिशा में सार्थक प्रगति कर सकता है।

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