रोहित रजक, भोपाल। सुप्रीम कोर्ट ने भोपाल गैस त्रासदी से जुड़े एक अहम मामले में याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। यह याचिका उन पीड़ितों से संबंधित थी जिन्हें या तो कम मुआवजा मिला या बिल्कुल नहीं मिला।

कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को हाईकोर्ट जाने की स्वतंत्रता दी है और कहा है कि वे अपनी बात वहाँ रख सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला इस आधार पर लिया कि यह मामला पहले ही कई बार कोर्ट के सामने आ चुका है, और अब इस पर दोबारा सुनवाई नहीं की जा सकती।

क्या था मामला ?


2-3 दिसंबर, 1984 की रात को भोपाल के यूनियन कार्बाइड कारखाने से जहरीली मिथाइल आइसोसाइनेट गैस का रिसाव हुआ था। यह दुनिया की सबसे भीषण औद्योगिक त्रासदियों में से एक मानी जाती है। इस हादसे में 5,479 लोगों की तत्काल मृत्यु हो गई थी और पांच लाख से अधिक लोग प्रभावित हुए थे। कई लोगों को स्थायी विकलांगता, कैंसर, फेफड़ों और गुर्दे से जुड़ी बीमारियों का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद, बड़ी संख्या में पीड़ितों को कम मुआवजा मिला या उन्हें मामूली रूप से घायल मान लिया गया।

याचिकाकर्ताओं की मांग
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में याचिकाकर्ताओं ने केंद्र और मध्य प्रदेश सरकार को यह निर्देश देने की मांग की थी कि वे प्रभावित लोगों की फिर से पहचान करें और उन्हें उचित मुआवजा दें। याचिका में कहा गया कि बड़ी संख्या में ऐसे पीड़ित हैं जो गंभीर बीमारियों से ग्रस्त हैं लेकिन उन्हें मामूली रूप से घायल व्यक्ति की श्रेणी में डालकर कम मुआवजा दिया गया।

वकील का तर्क
याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील ने तर्क दिया कि सरकारी एजेंसियों की गलती से हजारों लोगों को कम श्रेणी में रखा गया है। बहुत से लोग कैंसर, किडनी फेल्योर, अस्थमा और अन्य गंभीर बीमारियों से पीड़ित हैं लेकिन उन्हें “मामूली रूप से घायल” करार दिया गया, जिससे उन्हें बहुत कम मुआवजा मिला। वकील ने यह भी कहा कि सरकार की लापरवाही के कारण आज भी कई लोग इलाज के लिए दर-दर भटक रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया
सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें जस्टिस बी. आर. गवई और विनीत चंद्र शामिल थे, ने कहा कि वे इस मामले पर अब कोई सुनवाई नहीं करेंगे। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को यह साफ किया कि यदि उन्हें लगता है कि उनके साथ अन्याय हुआ है, तो वे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं।

कोर्ट ने दो टूक शब्दों में कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही इस मामले पर कई बार सुनवाई कर चुका है और बार-बार एक ही मुद्दे पर चर्चा नहीं की जा सकती।

कोर्ट ने क्या कहा ?
पीठ ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ताओं की तरफ से जो तथ्य रखे गए हैं, वे पहले से रिकॉर्ड में हैं और उन्हें लेकर पहले भी न्यायिक निर्णय दिए जा चुके हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ कर दिया कि वह अब केंद्र या राज्य सरकार को कोई नया निर्देश नहीं दे सकता। इसके बजाय पीड़ितों को सलाह दी गई है कि वे अपनी बात संबंधित हाईकोर्ट के समक्ष रखें।

गैस त्रासदी का आज भी असर
भोपाल गैस त्रासदी को 40 साल होने को हैं लेकिन आज भी हजारों लोग उसके दुष्परिणाम भुगत रहे हैं। रिपोर्टों के अनुसार, गैस प्रभावित इलाकों में लोग आज भी कैंसर, श्वसन संबंधी बीमारियां, किडनी की खराबी, त्वचा रोग और मानसिक समस्याओं से जूझ रहे हैं। लेकिन उन्हें उचित मुआवजा और इलाज की सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब याचिकाकर्ताओं को उच्च न्यायालय का रुख करना होगा। हालांकि यह फैसला कानूनी रूप से उचित हो सकता है, लेकिन यह उन हजारों पीड़ितों के लिए निराशाजनक है जो अब भी न्याय की आस लगाए बैठे हैं।

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