Suvangi Pradhan: अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से जुड़ी फंडिंग को लेकर एक बार फिर बड़ा खुलासा हुआ है। ट्रम्प ने बीते एक साल में करीब ₹18 हजार करोड़ का चंदा जुटाया। इस भारी-भरकम चंदे के बदले दानदाताओं को नीतिगत फैसलों, टैक्स छूट, सरकारी कॉन्ट्रैक्ट और रेगुलेटरी राहत जैसे करोड़ों डॉलर के फायदे मिले।
इस सूची में टेक्नोलॉजी, रियल एस्टेट, फार्मा और फाइनेंस सेक्टर के दिग्गज शामिल हैं
खास बात यह है कि इस लिस्ट में 6 भारतवंशी कारोबारी और सीईओ भी बताए जा रहे हैं, जिनमें गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई और माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ सत्या नडेला जैसे बड़े नाम शामिल हैं। ट्रम्प समर्थित सुपर PAC और अन्य फंडरेजिंग प्लेटफॉर्म के जरिए यह चंदा इकट्ठा किया गया। दान देने वाली कंपनियों और व्यक्तियों को बदले में कॉरपोरेट टैक्स में राहत, इमिग्रेशन से जुड़े नियमों में नरमी, और सरकारी एजेंसियों के साथ बड़े सौदे मिलने का रास्ता आसान हुआ।
भारतवंशी दानदाताओं की भूमिका को लेकर भी चर्चा तेज है
रिपोर्ट में कहा गया है कि इन लोगों ने व्यक्तिगत या कॉरपोरेट स्तर पर चंदा दिया, जिसके बाद उनकी कंपनियों को अमेरिकी बाजार में विस्तार, वीजा नीतियों में सहूलियत और टैक्स से जुड़े फायदे मिले। हालांकि सुंदर पिचाई और सत्या नडेला जैसे नामों से जुड़ी कंपनियों ने सीधे राजनीतिक सौदेबाजी के आरोपों से इनकार किया है और कहा है कि उनका चंदा कानूनी प्रक्रिया के तहत था। टेक कंपनियों को एंटी-ट्रस्ट कार्रवाइयों में नरमी और रेगुलेटरी दबाव कम होने का लाभ मिला, जबकि रियल एस्टेट और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े दानदाताओं को सरकारी परियोजनाओं में प्राथमिकता मिलने की बात सामने आई है।
यह मामला अमेरिका की चुनावी फंडिंग प्रणाली पर फिर सवाल खड़े करता है
आलोचकों के मुताबिक, बड़े चंदे लोकतंत्र को प्रभावित करते हैं और नीतियां आम जनता के बजाय कॉरपोरेट हितों के अनुसार तय होती हैं। वहीं ट्रम्प समर्थकों का तर्क है कि चंदा जुटाना अमेरिकी राजनीति का सामान्य हिस्सा है और इसमें कोई गैरकानूनी बात नहीं है। फिलहाल यह मुद्दा अमेरिकी राजनीति में बहस का केंद्र बना हुआ है और आने वाले चुनावों में इसका असर साफ तौर पर देखने को मिल सकता है।
