रोहित रजक रिपोर्ट: भोपाल मध्यप्रदेश मानव अधिकार आयोग का गठन उन लोगों की आवाज़ बनने के लिए किया गया था, जिन्हें कहीं और न्याय नहीं मिल पाता।

लेकिन आज वही आयोग खुद गुमनामी और लाचारी की स्थिति में पहुंच गया है। रोज़ाना मिलने वाली दर्जनों शिकायतें सिर्फ फाइलों में दर्ज होकर रह जाती हैं, क्योंकि सुनवाई करने वाला ही कोई नहीं बचा।

राज्य मानव अधिकार आयोग में तीन सदस्यों का पैनल होना चाहिए, जिसमें एक अध्यक्ष और दो सदस्य होते हैं। लेकिन फिलहाल सिर्फ एक सदस्य ही काम पर हैं।

पीड़ितों को न्याय नहीं मिल रहा है।

बाकी दोनों पद कई महीनों से खाली पड़े हैं। बड़ी चिंता की बात यह है कि जो एकमात्र सदस्य कार्यरत हैं, वे भी दो महीने बाद रिटायर हो जाएंगे।

इसके बाद आयोग पूरी तरह खाली हो जाएगा। न्याय के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति इस स्थिति के कारण आयोग में न तो कोई बड़ी कार्रवाई हो पा रही है और न ही पीड़ितों को न्याय मिल रहा है।

केवल नोटिस जारी कर देने भर की प्रक्रिया चल रही है। आयोग की जिम्मेदारी होती है कि वह मानव अधिकार उल्लंघन के मामलों में जांच कर रिपोर्ट राज्य सरकार को भेजे।

लेकिन जब पूरा पैनल ही मौजूद नहीं, तो न जांच हो रही है और न रिपोर्ट बन रही है। रोज़ाना आयोग में लगभग 10 मामले ऐसे आते हैं जिनमें मानवाधिकार हनन की शिकायत होती है।

लेकिन अधिकतर मामलों में केवल संबंधित पक्ष को “समझाइश” दी जाती है। पीड़ितों को वास्तविक राहत मिलना मुश्किल हो गया है।

आयोग के पास जांच अधिकारियों की भी कमी है, जिससे मामलों में देर और अनदेखी बढ़ती जा रही है।

सरकार की अनदेखी बनी सबसे बड़ी बाधा

आयोग की स्थिति सुधारने के लिए जरूरी है कि खाली पदों पर नियुक्तियां हों। लेकिन हैरानी की बात यह है कि न तो राज्य सरकार ने इस दिशा में कोई कदम उठाया है, न ही कोई प्रक्रिया शुरू की गई है।

सूत्रों के अनुसार, नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर कोई हलचल नहीं है। यह स्थिति आयोग की गंभीरता पर सवाल खड़े करती है।

मप्र मानव अधिकार आयोग में नियुक्तियों के लिए राज्य सरकार को न्यायपालिका और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों की सलाह से अध्यक्ष और सदस्यों का चयन करना होता है।

लेकिन यह प्रक्रिया लंबे समय से ठप पड़ी है। अगर यही हाल रहा, तो आने वाले समय में आयोग पूरी तरह से निष्क्रिय हो जाएगा।

पीड़ितों की उम्मीदें हो रहीं खत्म

आयोग में सुनवाई नहीं होने से सबसे बड़ा नुकसान आम लोगों को हो रहा है। वे लोग जो थानों, अदालतों या प्रशासन से थक हार कर आयोग में न्याय की उम्मीद लेकर आते हैं, उन्हें सिर्फ निराशा ही हाथ लगती है।

कई मामलों में तो पीड़ितों को सालों से जवाब नहीं मिला है।एक उदाहरण के तौर पर, पिछले महीने एक महिला ने पुलिस अत्याचार की शिकायत आयोग में की थी, लेकिन अब तक कोई सुनवाई नहीं हुई।

उसे सिर्फ एक कागज़ का नोटिस मिला, जिसमें कहा गया था कि “संबंधित पक्ष को पत्र भेजा गया है, जवाब आने पर कार्रवाई होगी।”

क्या यही है मानव अधिकार की रक्षा?

ऐसे हालात में सवाल उठता है कि अगर मानव अधिकार आयोग खुद ही मौन हो जाए, तो आम जनता कहां जाए? क्या न्याय के लिए बनाई गई संस्थाएं सिर्फ नाम की रह जाएंगी?

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