Muskan Garg: इस बार देव दिवाली पर वाराणसी के 84 घाटों पर लगभग 25 लाख दीये जलाए गए है, जो काशी की सुंदरता को एक नए स्तर पर ले जा रहे है। सिर्फ घाट ही नहीं, बल्कि गंगा के उस पार रेतीले तट पर भी दीपक जलाए गए है। शाम ढलते ही गंगा किनारे की यह रोशनी सभी को आकर्षित कर रही है। जगमग करते दियो की रोशनी का नजारा देखते ही वन रहा है।

देवदीपावली कब और क्यों मनाई जाती है:
भारत में दीपावली के पंद्रह दिन बाद आने वाली देवदीपावली को काशी की आत्मा कहा जाता हैं। इस दिन पूरा वाराणसी ऐसा लगता है मानो स्वर्ग खुद पृथ्वी पर उतर आया हो। देवदीपावली का मतलब ही है—देवताओं की दीपावली। पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन देवता गंगा तट पर खुद आकर दीप प्राज्लित करते हैं। यह पर्व कार्तिक पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। कहा जाता है कि इस दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नामक असुर का वध किया था, इसलिए इसे “त्रिपुरारी पूर्णिमा” भी कहते हैं। काशीवासियों के लिए यह दिन केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि आस्था और अध्यात्म का एक अद्भुत जश्न है।

घाटों पर श्री गंगा मैया आरती की चमक:
शाम होते ही, गंगा मैया के घाटों पर हजारों दीए जल उठते हैं, जिससे पूरा वातावरण चमक उठता है। दीयों की पंक्तियाँ गंगा जल में प्रतिबिंबित होकर दशाश्वमेध, राजघाट, अस्सी, मणिकर्णिका और पंचगंगा घाटों पर अद्भुत दृश्य बनाती हैं। दीपों की लौ, घंटियों की ध्वनि और मंत्रोच्चार गंगा आरती के दौरान वातावरण को भक्तिमय कर देते है।

देवदीपवली का महत्व:
काशी की देवदीपावली न केवल धार्मिक महत्व रखती है, बल्कि पर्यटन और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु और पर्यटक इस दिव्य दृश्य के साक्षी बनने वाराणसी आते हैं। घाटों पर भजन-संध्या, शास्त्रीय संगीत, नृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते है।
श्री गंगा जी में दीए प्रवाहित करते समय लोग अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करते हैं। यह पर्व हमें यह संदेश देता है कि अंधकार पर प्रकाश, और बुराई पर अच्छाई की विजय सदैव संभव है।


देवदीपावली के दिन काशी का हर कोना, हर घाट, हर दीपक एक ही बात कहता है:
“जहाँ गंगा बहती है, वहाँ दिव्यता स्वयं मुस्कुराती है।”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *