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Kajal Jatav: दक्षिण कोलकाता के साउथ कलकत्ता लॉ कॉलेज में 25 जून की रात एक युवती के साथ गैंगरेप का सनसनीखेज मामला सामने आया है. पीड़िता के बयान और शुरुआती जांच में सामने आए तथ्यों के आधार पर पुलिस ने तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया है. इनमें एक पूर्व छात्र नेता है, जबकि दो मौजूदा छात्र हैं.

पीड़िता के शरीर पर दांत के निशान, खरोंच, और अन्य चोटें भी पाई गई हैं जो यह दर्शाती हैं कि कितना भयावह अपराध हुआ है। पीड़िता ने एफआईआर में बताया कि मुख्य आरोपी ने शादी के लिए दबाव डाला जब उसने इंकार किया तो धमकी दी गई कि उसके मत पिता को झूठे केस में फंसा दिया जाएगा। वह रोती रही लेकिन आरोपियों ने सारी हदें पार कर दीं। इतना ही नहीं आरोपियों ने इस कृत्य का वीडियो मोबाइल में रिकॉर्ड कर पीड़िता को ब्लैकमेल किया।

आखिर कब खत्म होगा ये सब?

क्यों आज भी औरत को एक खिलौना मात्र समझा जाता है? क्यों इतना कुछ सहना पड़ रहा है? जो लोग ये करते हैं, क्या उनके घर में लड़कियां नहीं होती? सवाल हमारे पास कई हैं, मगर जवाब के नाम पर कुछ नहीं। हर बार अपराधी अपराध करते हैं, शहरों में केंडल मार्च किए जाते हैं, आरोपियों का पता चल जाए तो न्यायालय सजा भी सुना देता है मगर क्या इस सबसे उन लोगों की सोच को बदला जा सकता है? शायद कभी नहीं। 

सर्वोच्च न्यायालय ने आपत्ति भी जताई है।

आम जनता की सोच को छोड़ हम यदि न्यायालय की ही बात करें तो हमें हाल ही के ऐसे बयान मिलेंगे जो मानवीयता से बिल्कुल परे हैं। इलाहबाद उच्च न्यायालय के जज की बलात्कार के मामले में की गई टिप्पणियां कुछ ऐसी ही हैं जिन पर सर्वोच्च न्यायालय ने आपत्ति भी जताई है।

माननीय जज जस्टिस संजय कुमार ने 11 मार्च को एक आरोपी को जमानत हुए कहा कि “लड़की ने खुद मुसीबत को आमंत्रित किया और इसके लिए वह खुद जिम्मेदार है।” एक लड़की आंखों कैसे अपने बलात्कार के लिए जिम्मेदार हो सकती है? इसका मतलब तो यह हुआ कि जितनी लड़कियां रात को बाहर निकालती हैं, छोटे कपड़े पहनती हैं, मेकअप करती हैं, किसी मर्द की बात की विरोध करती हैं, उन सबकी गलती होती है। क्या उन लड़कों की कोई गलती नहीं? उन्हें क्यों किसी भी लड़की को देख ये खयाल आता है कि उन्हें ऐसा कुछ करना ही है जो सरासर गलत है, वीभत्स है।

इससे पहले भी जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा ने 17 मार्च को कहा कि “स्तन पकड़ना और पैजामे की डोरी को तोड़ना बलात्कार का प्रयास नहीं माना जा सकता”। ऐसी परिस्थिति में एक लड़की को क्या करना होगा? क्या वह उस प्रतीक्षा में रहे कि कब उसके साथ आगे कुछ भयावह हो जिसके उपरांत वह आरोपी को सजा दिला सके? कितने दुख की बात है यह की न्याय के रक्षक खुद इस प्रकार की बात कर रहे हैं।

अब भी हर दिन लगभग 86 रेप होते हैं और ये आंकड़े आए दिन बढ़ते ही जा रहे हैं। और इनके बढ़ने की वजह पूछें तो बस यही है कि ज्यादातर आरोपी या तो बारी हो जाते हैं या मामले अदालत तक पहुंच ही नहीं पाते। बलात्कार मामले में फांसी की सजा के प्रावधान के बाद भी 24 साल में कुछ ही दुष्कर्मियों को सजा मिली है।

हम रोज सुबह उठते हैं और एक नया केस सामने आ जाता है, ये कब थमेगा पता नहीं मगर इतना हम यक़ीनन कर सकते हैं कि अगर शुरुआत करनी ही है तो खुद के घर से करें। बेटों को सिखाएं कि क्या सही है और क्या गलत क्योंकि यदि हम उन्हें ही नहीं समझा सके तो उम्मीद की कहीं भी कोई गुंजाइश नहीं।

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