Surbhi yadav: हिन्दी सिनेमा की फिल्म 120 बहादुर एक सच्ची घटना पर आधारित फिल्म है। यह फिल्म 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान रेजांग ला की ऐतिहासिक लड़ाई पर आधारित है, जिसमें भारतीय सेना के 120 सैनिकों ने चीन के लगभग 3000 सैनिकों का सामना किया था। मुख्य भूमिका में फरहान अख्तर परमवीर चक्र विजेता मेजर शैतान सिंह भाटी का किरदार निभा रहे हैं, जो चार्ली कंपनी के सैनिकों का नेतृत्व करते थे। फिल्म सैनिकों के अदम्य साहस, देशभक्ति, बहादुर बलिदान और वीरता की कहानी को दर्शाती है।
1962 के युद्ध के अंत में 120 ही सैनिक बचे थे। इन सैनिकों का कंट्रोल रूम से संपर्क टूट चुका था, जहाँ किसी प्रकार की कोई मदद नहीं पहुँच पा रही थी। इसके बावजूद भी इन 120 सैनिकों ने, जिनमें से अधिकतर अहीर समुदाय से आते थे, अपनी आखिरी सांस तक लड़ाई लड़ी। इसलिए इस फिल्म का नाम 120 बहादुर रखा गया।
फिल्म की असली कहानी
1962 में भारत और चीन के बीच युद्ध अक्टूबर से नवंबर तक चला था। चीन ने एक तरफ युद्धविराम की घोषणा की और भारत को हार का सामना करना पड़ा, जिससे भारत को राजनीतिक और सामाजिक रूप से बड़ा झटका लगा था।
जंग की असली वजह
युद्ध का मुख्य कारण अक्साई चिन और अरुणाचल प्रदेश के क्षेत्र पर संप्रभुता को लेकर विवाद था। 1959 में दलाई लामा के भारत में शरण लेने से चीन नाराज़ था और उसे लगा कि भारत तिब्बत में गतिविधियों का समर्थन कर रहा है। भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने पंचशील समझौते के तहत शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की कोशिश की थी, लेकिन यह सफल नहीं हुआ।
चीन ने एक तरफ युद्धविराम की घोषणा की थी।
युद्ध में चीन की स्पष्ट जीत हुई, जिसके बाद चीन ने युद्धविराम की घोषणा की और युद्ध समाप्त हुआ। चीन ने भारत की लगभग 38,000 वर्ग किलोमीटर जमीन पर कब्ज़ा कर लिया था। भारत के 12,000 सैनिक चीन के 80,000 सैनिकों से लड़े थे, जिसमें सैनिकों के बीच बड़ा अंतर था।
रिलीज़ से पहले ही विवादों में फिल्म
फिल्म 120 बहादुर रिलीज़ से पहले ही विवादों में घिर गई है। इस फिल्म का विरोध यादव समुदाय कर रहा है। उनका कहना है कि फिल्म का नाम बदलकर 120 वीर अहीर कर दिया जाना चाहिए, ताकि 1962 के रेजांग-ला युद्ध में 120 अहीर सैनिकों की वीरता और बलिदान को सही रूप से दिखाया जा सके। विरोध कर रहे लोगों का तर्क है कि फिल्म का मौजूदा नाम उनकी विशिष्ट पहचान और बलिदान का सम्मान नहीं करता है, इसलिए फिल्म का नाम बदलना ज़रूरी है ताकि फिल्म वास्तविक इतिहास और समुदाय के योगदान को सम्मान दे सके।
