Surbhi yadav: देश का दिल मध्य प्रदेश 1 नवंबर 2025 यानी आज अपना 59वां स्थापना दिवस मना रहा है। चार राज्यों महाकौशल, मध्य भारत, विंध्य प्रदेश और भोपाल को मिलाकर मध्य प्रदेश बनाया गया। 1956 में गठन से लेकर आज तक प्रदेश का सफर उतार-चढ़ाव भरा रहा। प्रदेश ने भयंकर गैस त्रासदी भी देखी और गौरव देने वाले पल भी। पर्यावरण के प्रति अपने अनूठे लगाव से मध्य प्रदेश ने पूरे भारत में अलग पहचान बनाई है। विंध्याचल की पर्वत श्रृंखला और प्रकृति की गोद में बसा यह प्रदेश अपनी अलग कहानी रखता है।

प्रदेश के गठन की कहानी

आजादी के 6 साल बाद भारत में राज्यों के पुनर्गठन के लिए 1953 में न्यायमूर्ति फज़ल अली की अध्यक्षता में राज्य पुनर्गठन आयोग बनाया गया। आयोग के सदस्य K.M. पाणिक्कर और हृदयनाथ कुंजरू ने महाकौशल, मध्य भारत, विंध्य प्रदेश और भोपाल का दौरा किया। 19 अक्टूबर 1955 को कांग्रेस कार्यसमिति ने आयोग की रिपोर्ट पर सहमति की मुहर लगा दी और 10 अक्टूबर 1956 को राज्य पुनर्गठन आयोग की रिपोर्ट प्रकाशित हुई।

अंग्रेज़ शासन से अस्तित्व में था मध्यप्रदेश

मध्य प्रदेश का अस्तित्व ब्रिटिश शासन से ही था। तब इसे सेंट्रल इंडिया कहा जाता था, जो पार्ट A, पार्ट B और पार्ट C में बंटा था। जबकि राजधानी भोपाल में गवर्नर नहीं बल्कि कमिश्नर हुआ करते थे। पार्ट A की राजधानी नागपुर थी। इसमें बुंदेलखंड और छत्तीसगढ़ की रियासतें शामिल थीं। इसी तरह पार्ट B की राजधानी ग्वालियर और इंदौर थी, जिसमें मालवा-निमाड़ की रियासतें शामिल थीं। चारों राज्यों के विलय के दौरान मध्य प्रांत के 150 विधायक, मध्य भारत के 88, विंध्यप्रदेश के 60 और भोपाल के 30 विधायक मिलाकर कुल 328 विधायकों ने मध्य प्रदेश विधानसभा का गठन किया। राज्य पुनर्गठन आयोग को सभी सिफारिशों पर विचार करने में लगभग 34 महीने यानी ढाई साल लगे। तब जाकर मध्य प्रदेश का असली स्वरूप सामने आया।

भाषा, संस्कृति और जनजातीय विविधता प्रदेश की पहचान

हिंदी राज्य की आधिकारिक भाषा है, जो पूरे प्रदेश में बोली और समझी जाती है। इसके अलावा मालवी, बुंदेली, बघेली और निमाड़ी जैसी क्षेत्रीय बोलियां भी प्रचलित हैं, जो मध्य प्रदेश की लोक कला, संगीत, नृत्य और त्योहारों को समृद्ध बनाती हैं। मध्य प्रदेश की 7 करोड़ से अधिक आबादी है, जिसमें लगभग 75% लोग ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं। राज्य अपनी जनजातीय संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ गोंड, भील, बैगा, भरिया, कोरकू जैसी जनजातियाँ निवास करती हैं। इनमें गोंड और भील सबसे बड़ी जनजातियाँ हैं, जो राज्य के दक्षिण और पश्चिमी इलाकों में बसती हैं। यह समुदाय कृषि, वन उपज और पारंपरिक कला को अपने जीवन से जोड़कर प्रदेश की पहचान की जीवात्मा बनाता है।

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