रिपोर्ट, काजल जाटव: अभी बिहार की राजनीति नई चीज देख रही है. राजनीतिक नेता से आंदोलन करने वाले प्रशांत किशोर (PK) ने जब “जन सुराज” की स्थापना की, तो उन्होंने सिर्फ एक पार्टी नहीं बनाई। बल्कि बिहार की राजनीति देखने का नया तरीका भी दिखाया।

आम लोग राजनीति में आते हैं दो कारण से —

  • पावर पाने के लिए, या
  • पैसे कमाने के लिए।

लेकिन प्रशांत किशोर के पास दोनों थे, लेकिन उन्होंने राजनीति इसलिए चुनी ताकि बिहार की दिशा बदले।

नेता बनने का मौका था, पर आंदोलन का रास्ता चुना

प्रशांत किशोर का करियर दिखाता है कि वो भारत के सबसे प्रभावी रणनीतिकार रहे हैं। उन्होंने नरेंद्र मोदी (2014), नीतीश कुमार (2015), अमरिंदर सिंह (2017), जगन मोहन रेड्डी (2019), और ममता बनर्जी (2021) जैसे नेताओं को चुनाव जिताने में मदद की। इतना करने के बाद भी, उन्होंने खुद कभी चुनाव नहीं लड़ा।

लेकिन क्यों?

PK कहते हैं कि, राजनीति मतलब पद या सम्मान पाने का काम नहीं है। वे कहते हैं कि, “अगर सिस्टम खराब है, तो नेता बदलने से कुछ नहीं होगा।” इसलिए, उन्होंने तय किया कि वो जनता के बीच जाएंगे। लोगों की राय और भागीदारी पर नई राजनीति शुरू करेंगे।

जन सुराज का मकसद: सिर्फ एक पार्टी नहीं

2 अक्टूबर 2024 को, जन सुराज पार्टी बनी। नाम से ही पता चलता है — “जन” यानी जनता, और “सुराज” यानी अच्छा शासन। PK का नारा है —“सही सोच, सही लोग, सही दिशा।”

इसका मतलब है कि वो ऐसे लोग लाना चाहते हैं जो न जाति, न धर्म, न पैसे के आधार पर टिकट लें। बल्कि, अपना काम और सेवा से राजनीति करें।

PK का नारा है —“सही सोच, सही लोग, सही दिशा।”

उनका लक्ष्य है —

  • साफ-सुथरी राजनीति
  • जनता का साथ
  • जवाबदेही और सुधार

वे इसे कहते हैं — “जनभागीदारी वाली सरकार,” यानी फैसले ऊपर से नहीं, नीचे से होंगे। यानि फेसला अब जनता के हाथ मे होगा।

पैसे की राजनीति से दूर: ₹200 करोड़ का अभियान

PK ने एक बड़ा कदम उठाया — उन्होंने उद्योगपतियों या कंपनियों से पैसे नहीं लिए। उन्होंने जनता से कहा कि हर कोई केवल ₹100 दे सकता है। ताकि पार्टी साफ तरीके से ₹200 करोड़ जुटा सके। यह एक अलग प्रयोग है, क्योंकि भारत की ज्यादातर पार्टियां उद्योगपतियों, ठेकेदारों और लॉबी पर भरोसा करती हैं।

पहली उम्मीदवार की लिस्ट और विवाद

अक्टूबर 2025 में, जन सुराज ने अपनी पहली उम्मीदवार लिस्ट (51 नाम) का ऐलान किया। सबसे खास बात ये थी कि, प्रशांत किशोर खुद लिस्ट में नहीं थे।

उन्होंने कहा — “जब तक जनता का भरोसा नहीं मिलेगा, मैं चुनाव नहीं लड़ूंगा।”

इस लिस्ट में शिक्षक, डॉक्टर, किसान और महिलाएं को तरजीह दी गई। पार्टी ने कहा कि, यह “बिहार में विचारधारा वाली राजनीति” की शुरुआत है।

लेकिन, सभी लोग खुश नहीं थे।

जन सुराज के सदस्य पुष्पा सिंह ने कहा कि, उन्होंने तीन साल तक काम किया, लेकिन उनको टिकट नहीं मिला। उन्होंने इसे “अन्याय” माना और कहा कि, मेहनत करने वालों को नज़रअंदाज करने से कार्यकर्ताओं का मन टूट सकता है। PK ने कहा कि टिकट बांटना पूरी तरह पारदर्शी था। ये मेरिट और समाज के हिसाब से हुआ, किसी प्रभाव से नहीं।

PK के आरोप और राजनीतिक भूचाल

प्रशांत किशोर अक्सर सीधे बोलते हैं। यह उनकी पहचान है। उन्होंने बिहार की बड़ी नेताओं पर आरोप लगाए हैं। इससे राजनीति में हलचल मच गई है।

अशोक चौधरी (JDU) पर आरोप

PK ने कहा कि मंत्री अशोक चौधरी और उनके परिवार ने “मानव वैभव विकास ट्रस्ट” से करीब ₹200 करोड़ की प्रॉपर्टी खरीदी है। उन्होंने कहा यह भ्रष्टाचार है और सत्ता का गलत इस्तेमाल है। इस पर अशोक चौधरी ने PK को ₹100 करोड़ की मानहानि का नोटिस भेजा। वह बोले, “PK बिना सबूत के झूठ फैला रहे हैं।”

तेजस्वी यादव (RJD) पर आरोप

PK ने कहा कि तेजस्वी यादव का वादा था कि हर परिवार को नौकरी मिलेगी। यह सब दिखावा है। उन्होंने पूछा —“जब मोदी जी 2 करोड़ नौकरियां नहीं दे सके, तो आप हर परिवार को नौकरी कैसे देंगे?” तेजस्वी यादव ने कहा PK असल में नीतीश कुमार की मदद कर रहे हैं। वह विपक्ष का वोट तोड़ना चाहते हैं।

नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी पर आरोप

PK ने कहा कि नीतीश कुमार ने खुद को बेच दिया। उन्होंने कहा —“जब नीतीश जी ने मोदी के कदम छुए, तब बिहार की इज्जत गिर गई।” उन्होंने भाजपा पर भी आरोप लगाया। वह बोले कि भाजपा “सत्ता के लिए काम करती है, जनता के लिए नहीं।”

राजनीति की नई सोच: विचार या आदमी?

PK कहते हैं कि उनकी पार्टी नेताओ पर ज्यादा ध्यान नहीं देती। उनका मकसद है कि लोग सिस्टम बदलें। वे चाहते हैं कि लोग “सिस्टम बदलने वाले नागरिक” बनें। वे कुर्सी के भूखे नेता नहीं हैं। उनकी नजर में बिहार को आगे बढ़ाने के लिए तीन चीजें जरूरी हैं:

  • शिक्षा,
  • स्वास्थ्य,
  • रोजगार, और
  • पारदर्शिता।

PK का मानना है कि जब तक जनता निर्णय में भाग नहीं लेती, तब तक विकास सिर्फ कागजों पर रहेगा।

आगे की चुनौतियाँ: सत्ता या बदलाव?

PK की राजनीति आसान नहीं है। कुछ विपक्षी कहते हैं कि वह “लोकप्रियता की भूख” हैं। कुछ कहते हैं कि उन्हें राजनीति का अनुभव नहीं है। लेकिन, उनकी रैलियों में लोग बड़ी संख्या में आ रहे हैं।

प्रशांत किशोर की ये कोशिश नए तरीके की राजनीति है। उन्होंने दिखाया कि कोई भी नेता सिर्फ सत्ता के लिए नहीं, बल्कि सिस्टम को बदलने के लिए भी आ सकता है। उनके पास ताकत और पैसा था, पर उन्होंने उसे जनता के लिए इस्तेमाल करना चुना।

अब, यह देखना है कि बिहार की जनता इस नई राजनीति को स्वीकार करती है या नहीं। 2025 का चुनाव इस बात का जवाब देगा। अगर जन सुराज जीतता है, तो यह पहली बार होगा जब लोग अपने विचारों के हिसाब से सरकार चुनेंगे।

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