रिपोर्ट, काजल जाटव: मध्यप्रदेश की राजनीति में तुलसीराम सिलावट एक ऐसा नाम है, जिन्होंने छात्र राजनीति से लेकर विधानसभा और मंत्री पद तक की यात्रा की है। उनका राजनीतिक करियर न केवल लंबा और विविधतापूर्ण है, बल्कि इसमें कई उतार-चढ़ाव, दल-बदल और विवाद भी रहे हैं। वर्तमान में वे सांवेर विधानसभा क्षेत्र से भारतीय जनता पार्टी के विधायक हैं और लगातार छठी बार विधानसभा पहुंचे हैं।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
तुलसीराम सिलावट का जन्म 5 नवंबर 1954 को इंदौर जिले के ग्राम पिवडाय में हुआ। उनके पिता ठाकुरदीन सिलावट एक साधारण कृषक परिवार से जुड़े थे। तुलसीराम ने एम.ए. (राजनीति शास्त्र) तक शिक्षा प्राप्त की और युवावस्था से ही राजनीति में सक्रिय हो गए। वे छात्र जीवन से ही संगठनात्मक गतिविधियों में हिस्सा लेने लगे और 1977-78 तथा 1978-79 में शासकीय कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय, इंदौर के छात्र संघ के अध्यक्ष बने। इसके बाद 1980-81 में वे देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर के छात्र संघ अध्यक्ष चुने गए और विश्वविद्यालय सीनेट व प्रतिनिधि पदों पर भी रहे।
छात्र राजनीति से नगर निगम तक
छात्र राजनीति में सक्रियता ने उन्हें सीधे जनसंपर्क और संगठनात्मक अनुभव प्रदान किया। 1982 में वे नगर निगम इंदौर के पार्षद बने। यह उनके लिए सक्रिय राजनीतिक जीवन की ठोस शुरुआत थी। इसके बाद कांग्रेस पार्टी ने उन्हें अवसर दिया और 1985 में वे पहली बार आठवीं विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए। इसी कार्यकाल में वे संसदीय सचिव (वन एवं पर्यटन) भी रहे।
कांग्रेस में लंबा राजनीतिक सफर
तुलसीराम सिलावट ने लंबे समय तक कांग्रेस पार्टी में कार्य किया। 1995 में वे नेहरू युवा केंद्र, भारत सरकार के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बने और उन्हें केंद्रीय मंत्री का दर्जा मिला। 1998 से 2003 तक वे मध्यप्रदेश ऊर्जा विकास निगम के अध्यक्ष रहे। इस दौरान भी उन्हें मंत्री स्तर का दर्जा प्राप्त था। वे अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य और प्रदेश कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष भी रहे।
मंत्री पद और कांग्रेस छोड़ने का बड़ा फैसला
सिलावट का करियर कई बार कांग्रेस पार्टी की राजनीति से जुड़ा रहा। 2007 के उपचुनाव में वे बारहवीं विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए। 2008 में तेरहवीं विधानसभा के सदस्य बने। 2018 में उन्होंने चौथी बार कांग्रेस की ओर से विधानसभा चुनाव जीता और 29 दिसंबर 2018 से 13 मार्च 2020 तक वे मध्यप्रदेश सरकार में लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री रहे।
लेकिन मार्च 2020 में मध्यप्रदेश की राजनीति में बड़ा राजनीतिक संकट आया, जब ज्योतिरादित्य सिंधिया के नेतृत्व में कई विधायकों ने कांग्रेस से इस्तीफा देकर भाजपा का दामन थाम लिया। सिलावट भी इनमें शामिल थे। उन्होंने 10 मार्च 2020 को विधायक पद से इस्तीफा दिया। इसके बाद 22 अप्रैल 2020 से 11 जुलाई 2020 तक वे भाजपा सरकार में जल संसाधन मंत्री बने और 12 जुलाई 2020 से मछुआ कल्याण एवं मत्स्य विकास विभाग का कार्यभार संभाला।
भाजपा में नई पारी
कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होने के बाद सिलावट ने उपचुनाव लड़ा। नवंबर 2020 के उपचुनाव में वे सांवेर विधानसभा से भाजपा प्रत्याशी बने और विजयी हुए। यह उनकी पांचवीं विधानसभा सदस्यता थी। 28 दिसंबर 2020 को उन्होंने विधायक पद की शपथ ली और 3 जनवरी 2021 को वे पुनः मंत्री बने। भाजपा सरकार में वे जल संसाधन, मछुआ कल्याण तथा मत्स्य विकास विभाग संभालते रहे। 2023 में उन्होंने छठी बार जीत दर्ज की और विधानसभा पहुंचे।
विधायक और मंत्री के रूप में कार्य
सिलावट का कार्यक्षेत्र मुख्यतः ग्रामीण और अर्ध-शहरी है। वे किसानों, मजदूरों और पिछड़े वर्गों के बीच प्रभाव रखते हैं। मंत्री और विधायक के रूप में उनके प्रमुख कार्य इस प्रकार रहे हैं:
- जल संसाधन और सिंचाई योजनाएँ – भाजपा सरकार में मंत्री रहते हुए उन्होंने सिंचाई परियोजनाओं और ग्रामीण जल आपूर्ति योजनाओं पर जोर दिया।
- किसान कल्याण – वे किसानों को सिंचाई सुविधाएं और फसल उत्पादन में सुधार हेतु नई नीतियों के पक्षधर रहे।
- मछुआ कल्याण विभाग – उन्होंने मछुआरों की आजीविका बढ़ाने और उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने पर ध्यान दिया।
- स्वास्थ्य सेवाएँ – कांग्रेस सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रहते हुए उन्होंने ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार और अस्पतालों के उन्नयन की योजनाएं लागू कीं।
वोट बैंक और राजनीतिक मजबूती
सांवेर विधानसभा क्षेत्र में सिलावट का आधार विशेष रूप से दलित और पिछड़े वर्गों के बीच मजबूत है। कांग्रेस में रहते हुए भी वे इस वर्ग का बड़ा समर्थन प्राप्त करते रहे और भाजपा में आने के बाद भी उनका यह आधार बना रहा। सिंधिया गुट के साथ आने से उन्हें अतिरिक्त राजनीतिक ताकत भी मिली। 2020 के उपचुनाव और 2023 के आम चुनाव में उनकी जीत इसी राजनीतिक समीकरण का परिणाम रही।
विवाद और आलोचनाएँ
तुलसीराम सिलावट का राजनीतिक जीवन विवादों से अछूता नहीं रहा।
- दल-बदल का आरोप – कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होने पर उन्हें अवसरवादी कहा गया। विपक्ष ने उन पर “पद और सत्ता की लालसा” का आरोप लगाया।
- जनता के बीच असंतोष – कुछ मौकों पर क्षेत्र की जनता ने स्थानीय समस्याओं के समाधान न होने पर नाराज़गी जताई।
- स्वास्थ्य मंत्री के रूप में आलोचना – 2018-2020 के कार्यकाल में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति को लेकर विपक्ष ने उन्हें कठघरे में खड़ा किया।
हालांकि इन विवादों के बावजूद सिलावट ने अपनी राजनीतिक पकड़ बनाए रखी और लगातार चुनाव जीतकर अपनी उपयोगिता साबित की।
तुलसीराम सिलावट का राजनीतिक सफर इस बात का उदाहरण है कि राजनीति में अवसर, समीकरण और जनता से जुड़ाव किस तरह से व्यक्ति को निरंतर आगे बढ़ाते हैं। छात्र राजनीति से शुरुआत करके उन्होंने छह बार विधानसभा तक का सफर तय किया और कई बार मंत्री पद भी संभाला। उनके दल-बदल को लेकर विवाद जरूर रहे, लेकिन जनता का समर्थन उन्हें लगातार मिलता रहा।
आज वे सांवेर क्षेत्र के एक अनुभवी और प्रभावशाली नेता के रूप में देखे जाते हैं। आने वाले समय में उनकी भूमिका न केवल क्षेत्रीय राजनीति बल्कि प्रदेश की सत्ता संतुलन में भी अहम हो सकती है।
