Rishita Gangrade
दीदी, मेरी बहू को अस्पताल ले चलो… वो दर्द में है!
ये आवाज़ थी रीना की, जो गाँव के हर घर में एक ‘आशा दीदी’ के नाम से जानी जाती है। सुबह 5 बजे उसकी नींद नहीं, बल्कि ज़िम्मेदारी उसे जगा देती है। वो न डॉक्टर है, न नर्स। उसके पास न बड़ी डिग्री है, न मोटा वेतन। लेकिन गांव की हर गर्भवती महिला, हर नवजात बच्चा और हर बीमार बुज़ुर्ग उसे ही सबसे पहले याद करता है।
ASHA — Accredited Social Health Activist, एक ऐसा शब्द जो सरकारी फाइलों में भले सूखा लगे, लेकिन हकीकत में ये महिलाएं गांवों की रीढ़ हैं।

जिम्मेदारियों की लंबी सूची, लेकिन अधिकारों की नहीं
ASHA वर्कर्स को सिर्फ टीकाकरण करना या अस्पताल में महिलाओं को ले जाना ही नहीं आता, वो घर-घर जाकर पोषण, साफ-सफाई, परिवार नियोजन और बच्चों की देखभाल पर भी काम करती हैं।
पर सोचिए — इतनी मेहनत के बदले उन्हें मिलता क्या है?
हर महीने 2000 से 3000 रुपये मानदेय — वो भी कई बार महीनों की देरी से। कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं, कोई स्थायी नौकरी नहीं।
साइकिल, थर्मामीटर और एक रजिस्टर: यही है इनकी दुनिया
कई बार रीना जैसी ASHA वर्कर को 6-7 किलोमीटर दूर पैदल जाना पड़ता है, क्योंकि उसका गांव पक्की सड़कों से दूर है। थर्मामीटर, ब्लड प्रेशर मॉनिटर और एक पुराना रजिस्टर उसका औज़ार है। बारिश हो, गर्मी हो या शादी का मौका — कोई बहाना नहीं चलता।
“हमारी ड्यूटी 24 घंटे की है, पर वेतन 4 घंटे का भी नहीं लगता,” रीना कहती है, मुस्कुराते हुए।
ज़िंदगी बचाने वाली, पर अपनी ज़िंदगी में असुरक्षित
COVID-19 के समय जब लोग घरों से निकलने से डरते थे, तब इन्हीं ASHA वर्कर्स ने घर-घर जाकर संक्रमितों को ढूंढ़ा, ट्रैकिंग की, टीके लगवाए और दवाएं दीं। कई ने अपनी जान भी गंवाई। लेकिन उन्हें ना PPE किट मिली, ना समय पर मास्क।
क्या इतनी बहादुरी का ये इनाम होना चाहिए?
सरकार का नजरिया और हकीकत
सरकार उन्हें “स्वास्थ्य योद्धा” कहती है, पर वेतन और सुविधा देने की बात आती है तो सब चुप। कई बार आंदोलन और धरनों के बावजूद इनकी मांगे अनसुनी रह जाती हैं। उन्हें न तो कर्मचारी का दर्जा मिला है, न ही पेंशन या बीमा।
फिर क्यों करती हैं ये काम?
रीना जवाब देती है, “क्योंकि जब किसी मां की आंखों में राहत दिखती है, या बच्चा मुस्कुराता है, तो लगता है मैंने कुछ अच्छा किया।”
ASHA वर्कर केवल कर्मचारी नहीं, वो एक मानवता की मिसाल हैं। उन्हें सिर्फ इंसेंटिव नहीं, इंसाफ चाहिए।
ASHA workers स्वास्थ्य सेवा की कड़ी नहीं हैं — वो समाज के सबसे कमजोर तबकों तक पहुंचने वाली सबसे पहली आशा हैं। अब वक्त है कि हम सिर्फ तालियाँ न बजाएं, बल्कि उन्हें वह सम्मान, वेतन और सुरक्षा दें जिसकी वो हकदार हैं।

