रानू यादव: 40,000 फीट की ऊंचाई, जहाँ तापमान माइनस 60 डिग्री तक गिर जाता है, और 6,700 किलोमीटर का यह लंबा सफर, जो करीब 10 घंटे का था। इस दौरान दो मासूमों को हवाई जहाज़ के पहिए के पास छिपकर यात्रा करनी पड़ी। यह सोचकर ही रूह काँप जाती है कि इतनी भीषण ठंड और ऑक्सीजन की कमी में वे कैसे जीवित रहे होंगे।
काबुल से दिल्ली की एक फ्लाइट में 13 साल के लड़के ने ऐसे ही छुप कर सफर किया। 94 मिनट का यह सफर उस 13 साल के अफगानी किशोर के लिए जिंदगी और मौत के बीच का संघर्ष बन गया था। काबुल से दिल्ली तक की KAM एयरलाइंस की फ्लाइट (RQ-4401) में वह सीट के नीचे नहीं, बल्कि लैंडिंग गियर में छिपकर आया था। जहाँ एक तरफ लोग फ्लाइट में आराम से सफर करते हैं, वहीं दूसरी तरफ यह लड़का मौत के मुँह में बैठकर यह खतरनाक यात्रा कर रहा था। यह खबर चौंकाती है कि कोई इतनी हिम्मत कर सकता है, खासकर तब जब ट्रेन में बिना टिकट यात्रा करने की खबरें अब हमें हैरान नहीं करती।

फ्लाइट के पहिए में छिपकर जानलेवा सफर करने की ये घटना कोई नई नहीं है। 1970 के दशक से अब तक 100 से भी ज्यादा ऐसे मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें से ज्यादातर में मौत ही हाथ लगती है।

1996 में पंजाब के दो भाइयों, प्रदीप सैनी और विजय सैनी की कहानी ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया था। दोनों ने माइनस 60 डिग्री सेल्सियस के तापमान में 10 घंटे की लंबी उड़ान को एक हवाई जहाज के लैंडिंग गियर में छिपकर पूरा करने की कोशिश की।

इस खतरनाक सफर में विजय सैनी की जान चली गई, जबकि प्रदीप सैनी को बेहद गंभीर हालत में पाया गया। बाद में उन्होंने मीडिया को बताया कि कैसे उन्होंने यह जानलेवा यात्रा की। यह घटना दिखाती है कि कैसे कुछ लोग बेहतर जिंदगी की तलाश में अपनी जान जोखिम में डाल देते हैं।

खालिस्तानी से जुड़े होने के शक, और देश छोड़ने की कहानी!
उस वक्त पंजाब में खालिस्तानी आतंकियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई चल रही थी। सुरक्षा बल संदिग्ध लोगों को पकड़कर पूछताछ कर रहे थे। इसी दौरान, प्रदीप और विजय सैनी पर भी खालिस्तानियों की मदद करने का शक जताया गया। उन्हें भी इस अभियान के तहत जांच का सामना करना पड़ा। इस दबाव और डर ने शायद उन्हें देश छोड़ने जैसा कदम उठाने पर मजबूर कर दिया। 22 साल के प्रदीप और 18 साल के विजय… दोनों लगातार यह कहते रहे कि उनका खालिस्तानियों से कोई संबंध नहीं है, लेकिन सुरक्षा बलों की पूछताछ खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी। इस लगातार हो रही पूछताछ से तंग आकर आखिरकार दोनों भाइयों ने देश छोड़ने का फैसला कर लिया।

माइनस 60 डिग्री तापमान,10 घंटे की फ्लाइट,6700 किमी का सफर!
अक्टूबर की उस रात, दोनों भाई किसी तरह दिल्ली एयरपोर्ट में घुसकर ब्रिटिश एयरवेज के प्लेन तक पहुँच गए। “द सन” वेबसाइट की रिपोर्ट के मुताबिक, उन्हें फ्लाइट के लैंडिंग गियर वाले हिस्से में छिपा दिया गया।

6,700 किलोमीटर का सफर, 10 घंटे की उड़ान और 40,000 फीट की ऊँचाई, जहाँ तापमान माइनस 60 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जाता है। उनके पास इस भीषण ठंड से बचने के लिए गर्म कपड़े तक नहीं थे।

इस जानलेवा यात्रा में जहाँ बड़े भाई प्रदीप सैनी की जान बच गई, वहीं दुर्भाग्य से छोटा भाई विजय सैनी इस भयानक ठंड और यात्रा को बर्दाश्त नहीं कर पाया और उसकी मौत हो गई। यह घटना दिखाती है कि जिंदगी की तलाश में उठाया गया एक गलत कदम कैसे सब कुछ खत्म कर सकता है।

खराब हालत और डर की स्थिति में मिले सैनी!
जब विमान हीथ्रो एयरपोर्ट पर उतरा, तो एयरपोर्ट स्टाफ ने प्रदीप सैनी को पूरी तरह भ्रम की हालत में डगमगाते हुए पाया। तुरंत उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उनका गंभीर हाइपोथर्मिया का इलाज हुआ। पूरी तरह ठीक होने में उन्हें काफी समय लगा।

वहीं, दूसरी ओर उनके छोटे भाई विजय की तलाश 5 दिन बाद खत्म हुई। उसका शव रिचमंड, सरे में मिला। अनुमान लगाया गया कि वह यात्रा की भयानक परिस्थितियों को झेल नहीं पाया और लैंडिंग गियर खुलने के दौरान नीचे गिर गया होगा। यह दुखद घटना यह भी बताती है कि फ्लाइट में इस तरह छिपकर यात्रा करना जानलेवा क्यों है।
अपने छोटे भाई विजय को खोने का दर्द प्रदीप को आज भी सालता है। उन्होंने ‘मेल ऑन संडे’ को दिए इंटरव्यू में बताया था, “अगर हम दोनों बच जाते तो भी ठीक था, या दोनों मर गए होते तो भी एक बात थी। लेकिन मैंने अपना छोटा भाई खो दिया, जो मेरा दोस्त भी था। हम साथ पले-बढ़े थे।” इस भयानक घटना के बाद प्रदीप छह साल तक डिप्रेशन में रहे, क्योंकि भाई को खोने का दुख उनके लिए
असहनीय था।

अब लंदन में ही रहते है प्रदीप!
कई कानूनी मुश्किलों का सामना करने के बाद, प्रदीप सैनी को आखिरकार ब्रिटेन में रहने की इजाजत मिल गई। आज वह नॉर्थ लंदन के वेम्बले में रहते हैं और उसी हीथ्रो एयरपोर्ट पर एक केटरिंग कंपनी में ड्राइवर के रूप में काम करते हैं, जहाँ एक समय उनकी जिंदगी और मौत के बीच का फासला कुछ ही पल का था। उन्होंने शादी की और उनके दो बेटे हैं, जो अब उनकी दुनिया हैं।

फ्लाइट में छिपकर सफर करना, मजबूरी चाहे जो भी हो, एक अवैध और जानलेवा कदम है। ज्यादातर मामलों में इसका अंजाम मौत ही होता है। आइए, ऐसे ही कुछ चर्चित और चौंकाने वाले मामलों पर एक नजर डालते हैं:

जुलाई 2019, केन्या
केन्या एयरवेज की फ्लाइट में एक व्यक्ति लैंडिंग गियर में छिपकर नैरोबी से लंदन तक का सफर कर रहा था। जब विमान हीथ्रो एयरपोर्ट पर लैंड हुआ, तो उसका शव एक बगीचे में मिला। डॉक्टरों ने बताया कि उसकी मौत ठंड और ऑक्सीजन की कमी से हुई थी।

अप्रैल 2014, अमेरिका
एक 16 साल का लड़का कैलिफोर्निया से हवाई के लिए डेल्टा एयरलाइंस की फ्लाइट के पहियों में छिपकर सफर कर रहा था। करीब 5 घंटे की उड़ान के बाद वह बेहोश मिला। उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ वह बच गया। बाद में उसने बताया कि वह घर से भाग रहा था।

फरवरी 2014, अफ्रीका
एक 24 साल का युवक गाम्बिया से स्पेन जाने वाली विमान में छिपकर सफर कर रहा था। विमान के लैंडिंग गियर में उसकी लाश मिली। अधिकारियों ने बताया कि वह हाइपोथर्मिया और दम घुटने से मर गया था।

अविश्वसनीय बचाव: जब 1969 में एक युवक ने जीती मौत से जंग

1969 की बात है। 22 साल के अरमांडो सोकारस रामिरेज़ ने हवाना से मैड्रिड तक की उड़ान के पहिए वाले हिस्से में छिपकर यात्रा की। यह सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं, लेकिन वह बच गए।

उन्होंने बाद में बताया कि इस दौरान उन्हें जानलेवा ठंड, गहरी नींद और कानों में असहनीय दर्द महसूस हुआ। हालांकि, इस उड़ान की ऊँचाई (29,000 फीट) जोहान्सबर्ग से लंदन वाली उड़ान से कम थी, इसलिए वहाँ का तापमान और ऑक्सीजन का स्तर थोड़ा बेहतर था। इस खतरनाक सफर में उन्हें शीतदंश (frostbite) हुआ, लेकिन कोई जानलेवा चोट नहीं लगी। उनकी यह कहानी आज भी साहस और उम्मीद की एक मिसाल है।
निष्कर्ष!
इन कहानियों से यह निष्कर्ष निकलता है कि फ्लाइट के लैंडिंग गियर या पहियों में छिपकर यात्रा करना एक बेहद खतरनाक और जानलेवा कदम है। चाहे इसकी वजह गरीबी हो, मजबूरी हो या बेहतर जीवन की तलाश हो, इस तरह के सफर का अंजाम ज्यादातर मामलों में दुखद ही होता है। ये घटनाएं दिखाती हैं कि ऐसी यात्राएँ कितनी खतरनाक होती हैं और इनका अंत अक्सर बेहद दुखद होता है।

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