आदेश चौहान :

क्या BJP अपने कोर वोट बैंक को कटने से बचा पाएगी ?
बिहार की राजनीति जातिगत समीकरणों का खेल मैदान रही है, मतलब बिहार में जाती के आधार पर तमाम पार्टियां वोट बटोरने की कोशिश करती है, बीते 35 साल से बिहार में सत्ता की चाबी पिछड़ी जाति के नेताओं के पास है, जिसमें चीफ मिनिस्टर रहे ,लालू प्रसाद यादव और वर्तमान मुख्य मंत्री नीतीश कुमार भी पिछड़ी जाति से आते है.

जब से फैसला एक परसेंट से भी कम वोटों का रह गया है ,तब से सवर्ण वोट सभी दलों के लिए निर्णायक हो गए हैं. 
बिहार में अगड़ी जाती के लोग, भूमिहार और ब्राह्मण वोट
BJP का कोर वोट बैंक है, लेकिन अब जन सूराज के प्रशांत किशोर के आ जाने से BJP को अघड़ों के वोट बटने का डर है, क्योंकि प्रशांत किशोर जाती से ,ब्राह्मण है, जन सूराज के मुखिया उदय सिंह, राजपूत जाती से है, मतलब जनसूरज पार्टी की कमान अगड़ी जाती के लोगों के पास है, जिस वजह से भारतीय जनता पार्टी को वोट कटने का डर है.

PK की बेगूसराय सीट पर उमड़ी भीड़ .
बेगूसराय बिहार का एक ऐसा जिला है, जहां जातिगत समीकरण NDA के पक्ष में रहता है. यहां भूमिहार लगभग 20% के करीब हैं तो ब्राह्मण करीब 10% हैं .
जाहिर है कि कुल 30 प्रतिशत वोट किसी भी दल के लिए निर्णायक होता है. 2020 चुनावों में भाजपा की अगुवाई वाले गठबंधन ने यहां की कुल सात में तीन सीटें जीत ली थीं. गिरिराज सिंह जैसे नेता यहां का केंद्रीय मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व करते हैं. लेकिन PK, जो खुद ब्राह्मण पृष्ठभूमि से हैं बीजीपी के इस किले पर सेंध लगाने के लिए तैयार हैं.

10 सितंबर को बछवाड़ा में PK की ‘बदलाव सभा’ ने स्थानीय राजनीति को हिला कर रख दिया. रैली का आयोजन बछवाड़ा प्रखंड के मैदान में हुआ, जहां PK ने 2 घंटे से ज्यादा भाषण दिया. भारी भीड़ जुटी जिसमें ज्यादातर युवा और भूमिहार-ब्राह्मण समाज के लोग शामिल थे.

PK ने NDA पर तीखा प्रहार किया . उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार भ्रष्टाचार के भीष्म पितामह हैं, और भाजपा उनका कवच-कुंडल बनी हुई है.  बेगूसराय जैसे जिलों में फैक्टरियां क्यों नहीं? पलायन क्यों? उन्होंने ‘राइट टू रिकॉल’ विधेयक और  50 लाख रोजगार का वादा दोहराया, जो ऊंची जातियों के शहरी युवाओं को आकर्षित करता है. रैली में PK ने कहा, मोदी जी ने 2014 में वादा किया था कि बिहार विकसित होगा, लेकिन 10 साल बाद भी हम मजदूरी के लिए दिल्ली जा रहे हैं. जाहिर है कि प्रशांत किशोर की बातें युवाओं को लुभा  रही हैं. भीड़ में नारे लगे बदलाव लाओ, बिहार बचाओ. लेकिन विवाद भी हुआ. स्थानीय भाजपा नेता ने इसे वोट-कटवा रैली कहा, जबकि PK समर्थकों ने इसे भूमिहार जागरण बताया.


भूरा बाल साफ करो कि फिर से उठने लगी गूंज.

पूर्व सांसद और बाहुबली नेता आनंद मोहन सिंह ने फिर से ‘भूरा बाल साफ करो’ नारे को जीवंत कर दिया है. मुजफ्फरपुर में रघुवंश प्रसाद सिंह की 5वीं पुण्यतिथि प सभा (13 सितंबर) में उन्होंने कहा, सिंहासन पर कौन बैठेगा, ये ‘भूरा बाल’ तय करेगा. 
यहां ‘भूरा बाल’ से तात्पर्य ऊपरी जातियों भूमिहार, ब्राह्मण, राजपूत और लाला (कायस्थ) से है, जो बिहार की कुल आबादी का 10.57 प्रतिशत हैं,  लेकिन राजनीतिक रूप से 30% सांसदों और 26% विधायकों को चुनने में निर्णायक हैं. 2020 चुनावों में 1% वोट अंतर से जीत-हार तय हुई थी, और आनंद का दावा है कि अगड़ी जातियों का वोट फिर से ‘भूचाल’ लाएगा.
दरअसल भारतीय जनता पार्टी हो या आनंद मोहन हों, सभी को लगता है कि सवर्णों का वोट इस बार प्रशांत किशोर और कांग्रेस में कुछ बंट रहा है.

इसलिए लालू यादव के यादव के जंगलराज के दिनों की याद को ताजा करने के लिए भूरा बाल साफ करो की चर्चा तेज हो गई है. जाहिर है कि यह सवर्णों को यह समझाने  की कोशिश है कि वो दिन याद करो जब तुम्हें साफ करने की कोशिश हो रही थी. अधिकतर सवर्ण युवकों ने बिहार छोड़कर दिल्ली-मुंबई-बेंगलुरू की राह पकड़ ली थी . मतलब साफ है कि कहीं न कहीं एनडीए नेताओं में यह डर सताने लगा है कि सवर्णों के वोट कट रहे हैं.

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