विशाखापट्टनम में हाल ही में सामने आए एक बड़े साइबर फ्रॉड केस में अब नया मोड़ आ गया है। यहां एक कथित रिटायर्ड प्राध्यापक ने लगभग 2 करोड़ रुपये की ठगी की शिकायत दर्ज कराई थी, लेकिन अब खुद उनकी शिक्षा और पहचान पर ही सवाल उठने लगे हैं। इस मामले ने जांच को और जटिल बना दिया है।

क्या है पूरा मामला?

एफआईआर संख्या RC0362025A0009 (25 जून 2025) के मुताबिक, डॉ. एम. बैटमैनबेन मौनिस्सामी, जिन्हें जेआईपीएमईआर (पांडिचेरी) का पूर्व प्राध्यापक बताया गया है, ने सीबीआई एसीबी, विशाखापट्टनम में शिकायत दी। उनका आरोप है कि उन्हें “H-10 नुवामा हेल्थ ग्रुप” नामक व्हाट्सएप ग्रुप के जरिए नकली निवेश योजना में फंसाया गया। इसके लिए उन्हें https://www.nuvamawealthc.com/ नाम की एक फर्जी वेबसाइट पर अकाउंट बनाने को कहा गया। ग्रुप से जुड़ी एक महिला खुद को नुवामा फंड्स की प्रतिनिधि बताकर लगातार उनसे संपर्क में रही।

पहले कथित रिटायर्ड प्राध्यापक ने 10,000 रुपये निवेश किए और 13,000 रुपये निकाल भी लिए। इससे उन्हें भरोसा हो गया और उन्होंने लगभग 1.92 करोड़ रुपये निवेश कर दिए। वर्चुअल अकाउंट में उन्हें दिखाया गया कि उनका पैसा बढ़कर 35 करोड़ रुपये हो गया है। लेकिन जब उन्होंने पैसा निकालना चाहा तो उनसे लाखों रुपये कमीशन मांगा गया। महिला ने पहले 32 लाख रुपये की मांग की, बाद में यह 25% पर तय हुआ। 30 मई 2025 को उन्होंने 7,90,989 रुपये कमीशन के रूप में भी दिए, लेकिन फिर भी उन्हें पैसा नहीं मिला। बाद में उन्होंने आशीष केहर नामक व्यक्ति से मदद मांगी, लेकिन वहां से भी पूरा कमीशन देने की बात कही गई। तब जाकर उन्हें एहसास हुआ कि यह पूरा मामला साइबर ठगी है और उनका लगभग 2 करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है।

इसके बाद डॉ. मौनिस्सामी ने 18 जून 2025 को सीबीआई एसीबी, विशाखापट्टनम में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत के आधार पर भारतीय न्याय संहिता (BNS 2023) की धाराओं और आईटी एक्ट 2000 की धारा 66C और 66D में केस दर्ज किया गया।

प्रोफेसर की पहचान पर संदेह! सीबीआई की जांच पर सवाल

अब इस मामले में एक बड़ा सवाल उठ गया है। जेआईपीएमईआर की आधिकारिक वेबसाइट पर 1982 से अब तक सभी प्राध्यापकों और निदेशकों की सूची दर्ज है। लेकिन उसमें डॉ. मौनिस्सामी का नाम कहीं भी नहीं है। संस्थान से पूछने पर भी उनकी नियुक्ति या प्रोफेसर पद पर कार्यकाल की कोई जानकारी नहीं मिल सकी। कुछ जगह कहा गया कि उन्होंने 2002 या 2003 के आसपास काम किया था, लेकिन इसका भी कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं मिला।

अग्नि पत्रिका की रिपोर्ट के मुताबिक, यह भी सामने आया कि डॉ. मौनिस्सामी कभी हाईकोर्ट या लोअर कोर्ट की सुनवाई में पेश नहीं हुए। यह जानकारी उस व्यक्ति के परिवार से मिली है, जिसे इस केस में सीबीआई की जांच के बाद पिछले तीन महीने से जेल में रखा गया है। इससे उनकी पहचान और पूरी घटना की सच्चाई पर और बड़े सवाल खड़े हो गए हैं।

अब सीबीआई की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं। अगर एफआईआर दर्ज कराने वाले की पहचान ही साफ नहीं है, तो क्या एजेंसी ने बिना जांच के ही एफआईआर दर्ज कर ली? एफआईआर में उन्हें “रिटायर्ड प्राध्यापक, जेआईपीएमईआर” बताया गया है, जबकि इसका कोई प्रमाण मौजूद नहीं है। इससे दो संभावनाएँ सामने आती हैं। या तो कथित डायरेक्टर ने झूठी पहचान का इस्तेमाल किया, या फिर जांच एजेंसी से बड़ी गलती हुई। इस वजह से मामला अब सिर्फ साइबर ठगी का नहीं रहा, बल्कि इसमें फर्जी पहचान का पहलू भी जुड़ गया है।

सबसे अहम सवाल यही है कि क्या वास्तव में साइबर अपराधियों ने निवेश के नाम पर करोड़ों रुपये की ठगी की, या फिर रिपोर्ट दर्ज कराने वाले की पहचान ही गलत है और इसके पीछे कोई और मकसद छिपा है। विश्वसनीय सूत्रों के मुताबिक, अभी तक ट्रांजैक्शन डीटेल्स कोर्ट में पेश नहीं की गई कि किस अकाउंट में पैसे आए, किस अकाउंट से पैसे गए, अकाउंट होल्डर कौन है जो केस को सवालों के घेरे में लाती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि सीबीआई को सबसे पहले रिपोर्ट दर्ज कराने वाले की पहचान और उनकी शिक्षा संबंधी दावे की पुष्टि करनी चाहिए थी। वरना यह मामला न सिर्फ साइबर ठगी बल्कि फर्जी पहचान का भी साबित हो सकता है।

By rishita gangrade

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