गीत : भारत अपनी समुद्री ताकत को नई ऊंचाइयों पर ले जाने की तैयारी कर रहा है। मुंबई की मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL) ने जर्मनी की कंपनी थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स (TKMS) के साथ साझेदारी में छह नई पीढ़ी की पारंपरिक सबमरीन बनाने के लिए कॉन्ट्रैक्ट की बातचीत शुरू कर दी है। यह प्रोजेक्ट 75(I) के तहत होगा और इसकी लागत लगभग 70,000 करोड़ रुपये है।

प्रोजेक्ट 75(आई) की विशेषताएं

  • इस प्रोजेक्ट के तहत छह नई पीढ़ी की पारंपरिक सबमरीन बनाई जाएंगी।
  • यह सबमरीन भारत की नौसैनिक क्षमता में बड़ा बदलाव लाएंगी और देश की समुद्री सुरक्षा को मजबूत करेंगी।
  • इस प्रोजेक्ट में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और लोकल मैन्युफैक्चरिंग के जरिए ‘मेक इन इंडिया’ पहल को आगे बढ़ाया जाएगा।

भारत की नौसैनिक चुनौतियां

  • भारत के पास फिलहाल 17 पारंपरिक सबमरीन हैं, जिनमें से कई 30 साल से भी पुरानी हैं।
  • इनमें से करीब एक-चौथाई अभी री‌फिट में हैं, यानी वे तुरंत ऑपरेशन के लिए उपलब्ध नहीं हैं।
  • नौसेना के सूत्रों का कहना है कि 17 पारंपरिक पनडुब्बियों में से नौ की बाकी सर्विस लाइफ 10 साल से भी कम है, जबकि पांच को 2031 से पहले डिकमिशन करना पड़ेगा।

MDL और TKMS की साझेदारी

  • MDL और TKMS की साझेदारी अब इस प्रोजेक्ट की इकलौती दावेदार है, क्योंकि L&T की बोली को नियमों के हिसाब से अमान्य करार दिया गया।
  • यह साझेदारी भारत और जर्मनी के बीच रणनीतिक और औद्योगिक रिश्तों को और गहरा करेगी।
  • इससे भारत को टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और लोकल मैन्युफैक्चरिंग के जरिए अपनी नौसैनिक क्षमता को मजबूत करने में मदद मिलेगी।

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