असम में समय-समय पर आदिवासी समुदायों के बीच “जनक्रांति” जैसा सामाजिक–राजनीतिक आंदोलन उभरता आया है। यह सिर्फ एक नाराजगी नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही उपेक्षा, पहचान की कमी, संवैधानिक अधिकारों की मांग और सांस्कृतिक अस्तित्व की रक्षा का संघर्ष है। हाल के वर्षों में कुछ आदिवासी समुदायों ने “अदालत समान” दर्जा (Scheduled Tribe, ST) की मांग, भूमि अधिकार, स्वायत्तता और सांस्कृतिक पहचान के नाम पर एकता और आंदोलन बढ़ाया है।
कारण और स्थिति
संवैधानिक मान्यता की कमी कई समुदाय जैसे कि कोच राजबोंग्शी, मोरन, मोटोक, चुतिया, मातक आदि को अभी तक ST का दर्जा नहीं मिला है। उन्हें महसूस होता है कि बेरोजगारी, शिक्षा, सरकारी नौकरियों में पिछड़ापन और विकास योजनाओं के लाभों में निष्कासन हो रहा है।
भूमि अधिकारों का नाश
असम के आदिवासी स्वतंत्र क्षेत्र जैसे कि करबी अंगलॉंग में भूमि की रक्षा को लेकर आंदोलन हो रहा है। स्थानीय प्रशासन पर आरोप हैं कि आदिवासी जमीन को कॉरपोरेट संस्थाओं को दिए जाने की छूट दी जा रही है, जिससे पारंपरिक जीवनयापन प्रभावित हो रहा है।

स्वतंत्रता और प्रशासनिक अधिकारों की मांग
छोटे आदिवासी बँड बेल्ट ब्लॉक्स की स्थापना, पड़ोसी समुदायों के साथ संवैधानिक समझौते (Sixth Schedule) के मार्ग पर स्वायत्त परिषदों का विस्तार आदि बातें शामिल हैं।
सांस्कृतिक मान-भाव और पहचान
“टी गार्डन” श्रेणी में रहने वाले आदिवासी समाजों ने कहा है कि उनके भाषा, रीति-रिवाज, सांस्कृतिक तौर–तरीकों की अनदेखी होती है। “टी ग्राउंड लेबर” या “अदिवासी चाटाल (Tea Garden Labour)” जैसे उपनाम उनकी पहचान को सीमित करते हैं|
वर्तमान आंदोलन की मुख्य घटनाएँ
- मोइरोगांव जनायुध्द और ज्ञापन मोइरोगांव जिला आदिवासी संघ ने सात बिंदुओं पर ज्ञापन राज्य सरकार को सौंपा जिसमें ST दर्जा, स्वतंत्र परिषदों का विस्तार और भूमि अधिकारों की रक्षा शामिल हैं।
- कोच राजबोंग्शी और प्रकाश-प्रदर्शन (Torchlight march) चिलराई कॉलेज से गोलाकगंज बाज़ार तक कोच राजबोंग्शी छात्रों ने मशाल जुलूस निकाला। पुलिस हस्तक्षेप के बाद तनाव बढ़ गया और व्यापक बंद की घोषणा हुई।
- ताई अहोम समुदाय की मांगें और धरना-प्रदर्शन ताई अहोम छात्रों के संगठन ATASU ने विधानसभा के निकट प्रदर्शन किया और ST दर्जा न मिलने पर आंदोलन को तेज करने की चेतावनी दी। नेताओं की गिरफ्तारी भी हुई।
- करबी अंगलॉंग भूमि विवाद Diphu में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुआ कि स्थानीय स्वतंत्र परिषद (KAAC) ने आदिवासी ज़मीन कॉर्पोरेट्स को निर्धारित की, जिसे विरोध करना पड़ा।
चुनौतियाँ और बाधाएँ

- संवैधानिक प्रक्रिया में देरी– ST दर्जा मिलने की स्वीकृति केंद्र-और राज्य सरकारों के बीच होती है, प्रक्रिया लंबी और जटिल है।
- भू-राजस्व और स्वतंत्रता के अधिकार अक्सर प्रशासनिक टूटना या राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण अधूरे रहते हैं।सांस्कृतिक भूल जाने का डर है क्योंकि भाषाएँ, लोक परंपराएँ और परंपरागत ज्ञान धीरे-धीरे ऍक्सटर्नल दबावों से प्रभावित हो रहे हैं।
- राजनीतिक लाभ-हानि का सवाल भी है – कई दलों के लिए ये मुद्दे चुनावी हथियार बन गए हैं, पर वास्तविक कार्रवाई सीमित दिखती है।
असम की आदिवासी जनता की “जनक्रांति” सिर्फ एक विरोध-आंदोलन नहीं, बल्कि एक आत्म-पहचान की लड़ाई है। जहां एक ओर संविधानिक अधिकार, पहचान और न्याय की मांग है, वहीं दूसरी ओर सरकारों, प्रशासन और समाज को यह निर्णय लेना चाहिए कि असम की विविध संस्कृति और आम-आदमी की संवेदनाएँ कितनी मायने रखती हैं। यदि सही समय-परिणाम और न्याय हो, तो यह संघर्ष शांतिपूर्ण तरीके से समाधान की ओर इशारा कर सकता है।
स्रोत (Sources):
- Morigaon Tribal Bodies’ protest, 7-Point Memorandum
- Koch-Rajbongshi Students’ Union torchlight march, demands for ST status
- ATASU protest for Tai Ahom ST status near Assam Assembly
- Adivasis protest in Biswanath for ST inclusion and identity protection
