Ladli bahna yojnaLadli bahna yojna

Rishita Gangrade: माँ को हर महीने ₹1250 मिलते हैं, लेकिन पापा अभी भी काम की तलाश में हैं. यह शब्द हैं रीवा जिले के एक 19 वर्षीय युवक के, जो अभी बेरोजगार है और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा है। उसकी बात में सच्चाई और एक अनकही टीस दोनों छिपी हैं।

मध्यप्रदेश सरकार की बहुचर्चित “लाड़ली बहना योजना” ने महिलाओं को आर्थिक रूप से ताकत दी है। घर की महिलाओं के खाते में हर महीने ₹1250 आने से घर की रसोई थोड़ी बेहतर हुई है, कुछ आत्मनिर्भरता भी आई है। गांव की महिलाओं को अब बैंक जाना आता है, खाता खुलवाना आता है, और पैसा निकालना भी। यह योजना सामाजिक बदलाव की ओर एक सकारात्मक कदम है, इसमें कोई शक नहीं।

लेकिन सवाल यह भी है कि क्या यह बदलाव संतुलित है?

जब एक तरफ सरकार महिलाओं को सशक्त करने की बात करती है, तो दूसरी तरफ युवा—खासकर पुरुष—स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगे हैं। गाँवों और छोटे शहरों में लड़कों के लिए रोजगार के अवसर सीमित हैं। सरकारी नौकरियों के फॉर्म तो आते हैं, लेकिन सीटें कम होती जा रही हैं। निजी क्षेत्र की नौकरियाँ भी बहुत कम या अस्थायी हैं।

“हमें क्या मिला?”

यह सवाल आज कई नौजवानों की जुबान पर है।

योजनाओं के केंद्र में महिलाओं को लाना निश्चित ही एक दूरदर्शी सोच है, क्योंकि वर्षों तक वे सामाजिक हाशिये पर रहीं। लेकिन सरकार की नीतियाँ तब ही सफल कहलाएँगी जब वे समाज के हर वर्ग को साथ लेकर चलें। अगर एक वर्ग को ऊपर उठाया जा रहा है, तो दूसरे वर्ग को पीछे छूटने का एहसास न हो—यही तो असली विकास का संतुलन है।

राजनीतिक नजरिए से देखें तो यह योजना महिलाओं को सीधे साधने की कोशिश है। चुनावी वर्ष में महिलाओं को लक्षित करना राजनीतिक रूप से कारगर रणनीति रही है। लेकिन क्या यह रणनीति दीर्घकालिक सामाजिक संतुलन को बिगाड़ तो नहीं रही?

एक तरफ महिला सशक्तिकरण, दूसरी तरफ युवा असंतोष।

बेरोजगारी सिर्फ एक आर्थिक मुद्दा नहीं है, यह सामाजिक तनाव का कारण बन सकती है। जब युवा खुद को खाली, ठुकराया हुआ और दिशाहीन महसूस करते हैं, तब निराशा पनपती है। यही निराशा कई बार कट्टरता, अपराध या आत्मघात जैसी खतरनाक दिशाओं में भी ले जाती है।

सरकार को यह समझना होगा कि “लाड़ली बहनें” और “बेरोजगार भाई” दोनों उसी घर के सदस्य हैं।यदि एक को आर्थिक सहारा मिल रहा है, तो दूसरे को रोजगार की गारंटी भी चाहिए।

योजनाएँ सिर्फ वोट बैंक बनाने के लिए नहीं, समाज को बेहतर और संतुलित बनाने के लिए बनती हैं। इसलिए वक्त है कि सरकार महिला योजनाओं के साथ-साथ युवाओं के लिए ठोस और ईमानदार रोजगार नीति भी लाए।

एक ऐसी नीति, जो उन्हें भी यह महसूस कराए कि वे सिर्फ आंकड़ों का हिस्सा नहीं, बल्कि देश के भविष्य हैं।

क्या अगली योजना “लाडले युवा” के नाम से आएगी? या फिर बेरोजगारी की यह चुप्पी किसी बड़े विस्फोट में बदलेगी—यह आने वाला वक्त तय करेगा।

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