रिपोर्ट, काजल जाटव: मध्यप्रदेश की राजनीति में इंदर सिंह परमार का नाम उन नेताओं में गिना जाता है जिन्होंने संगठन से अपनी यात्रा शुरू कर जनप्रतिनिधित्व और मंत्री पद तक का लंबा सफर तय किया। तीन बार विधायक बनने वाले परमार वर्तमान में उच्च शिक्षा, आयुष, तकनीकी शिक्षा तथा कौशल विकास विभाग के मंत्री हैं। शाजापुर जिले की शुजालपुर विधानसभा सीट से उनका लगातार बढ़ता प्रभाव इस बात का प्रमाण है कि जनता के बीच उनकी पकड़ मजबूत रही है।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
1 अगस्त 1964 को शाजापुर जिले के पोचानेर गाँव में जन्मे इंदर सिंह परमार का परिवार कृषि से जुड़ा रहा। शिक्षा के प्रति उनकी गहरी रुचि ने उन्हें बी.एस.सी. और एल.एल.बी. की डिग्रियाँ दिलाईं। पढ़ाई के दिनों से ही वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े और समाज सेवा को जीवन का ध्येय बनाया। छात्र राजनीति में भी उन्होंने सक्रियता दिखाई और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (जैन संभाग) के संगठन मंत्री रहे।
संगठनात्मक अनुभव और राजनीतिक शुरुआत
संघ और एबीवीपी की पृष्ठभूमि से निकलकर परमार ने भाजपा संगठन में भी अपनी जिम्मेदारियाँ निभाईं। वे शाजापुर जिले के महामंत्री और प्रदेश मंत्री के रूप में संगठन के भीतर मजबूत स्थिति में आए। यही अनुभव उनके लिए विधानसभा चुनाव की राह खोलने वाला साबित हुआ।
विधानसभा में प्रतिनिधित्व
- 2013 चुनाव: इंदर सिंह परमार पहली बार शुजालपुर विधानसभा सीट से भाजपा उम्मीदवार के रूप में निर्वाचित हुए। इस चुनाव में उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी को बड़े अंतर से हराया।
- 2018 चुनाव: परमार ने दूसरी बार जनता का विश्वास जीता और विधानसभा पहुँचे। इस दौरान वे याचिका एवं प्राक्कलन समिति के सदस्य और सरकार की चिकित्सा-शिक्षा सलाहकार समिति में भी सक्रिय रहे।
- 2023 चुनाव: लगातार तीसरी बार विधायक बनकर उन्होंने अपनी राजनीतिक पकड़ को और मजबूत किया।
मंत्री पद और जिम्मेदारियाँ
2 जुलाई 2020 को उन्हें राज्य मंत्रिपरिषद में स्थान मिला और वे स्कूल शिक्षा विभाग में स्वतंत्र प्रभार मंत्री बनाए गए। बाद में 2023 में उन्हें उच्च शिक्षा, आयुष, तकनीकी शिक्षा तथा कौशल विकास एवं रोजगार विभाग का जिम्मा सौंपा गया।
शिक्षा मंत्री रहते हुए परमार ने कई महत्त्वपूर्ण फैसले लिए। उन्होंने सरकारी स्कूलों में गुणवत्ता सुधार, तकनीकी शिक्षा में कौशल आधारित पाठ्यक्रम और आयुष चिकित्सा पद्धतियों को बढ़ावा देने पर जोर दिया। हालांकि, कई बार उनके कुछ फैसले और बयान विवादों में भी आए।
कार्य और पहल
- शिक्षा सुधार: परमार ने “नवीन शिक्षा नीति” को लागू करने में सक्रिय भूमिका निभाई। स्कूलों में ई-लर्निंग और डिजिटल क्लासेज की व्यवस्था बढ़ाने के प्रयास किए।
- आयुष को प्रोत्साहन: आयुर्वेदिक कॉलेजों और योग शिक्षा को विस्तार देने पर ध्यान दिया।
- तकनीकी शिक्षा व कौशल विकास: प्रदेश के युवाओं को रोजगारोन्मुखी शिक्षा देने के लिए नए प्रशिक्षण केंद्रों की शुरुआत की गई।
- संगठन से जुड़े: मंत्री बनने के बाद भी उन्होंने लगातार संघ और भाजपा कार्यकर्ताओं से संवाद बनाए रखा।
मतदाता आधार और चुनावी सफलता
शुजालपुर विधानसभा सीट पर परमार की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण उनकी ज़मीनी सक्रियता रही है। वे गाँव-गाँव जाकर किसानों, युवाओं और सामान्य वर्ग की समस्याएँ सुनते रहे हैं। 2013 से अब तक हुए तीनों चुनावों में भाजपा के पक्ष में भारी मतों से जीत उनकी पकड़ का प्रमाण है। उनकी छवि एक सहज और कार्यकर्ताओं को साथ लेकर चलने वाले नेता की रही है।
विवाद और आलोचनाएँ
राजनीति में सफलता के साथ विवाद भी कदम से कदम मिलाते हैं और इंदर सिंह परमार इसका अपवाद नहीं हैं।
- शिक्षा नीति पर विवाद: स्कूल शिक्षा मंत्री रहते हुए कई बार नए नियमों को लेकर शिक्षकों और विपक्ष ने उन पर आरोप लगाए कि फैसले बिना पर्याप्त चर्चा के लिए जाते हैं।
- बयानबाजी: कुछ अवसरों पर उनके बयानों ने मीडिया और विपक्ष का ध्यान खींचा। शिक्षा क्षेत्र से जुड़े मामलों पर विपक्ष ने उन्हें असंवेदनशील तक कहा।
- कर्मचारी असंतोष: शिक्षकों और शिक्षा विभाग के कर्मचारियों ने समय-समय पर उनकी नीतियों पर विरोध दर्ज कराया।
इंदर सिंह परमार की राजनीति संगठनात्मक मजबूती, शिक्षा सुधारों और जनसंपर्क के बीच संतुलन साधने का प्रयास करती दिखती है। तीन बार लगातार विधायक बनने और मंत्री पद पर जिम्मेदारी मिलने से स्पष्ट है कि जनता और संगठन दोनों में उनका विश्वास कायम है। हालांकि, शिक्षा और प्रशासनिक नीतियों पर उठते विवाद उनके राजनीतिक जीवन में चुनौतियाँ भी प्रस्तुत करते हैं।
