रिपोर्ट रोहित रजक भोपाल। मध्य प्रदेश की राजनीति में श्योपुर विधानसभा सीट हमेशा से चर्चा का केंद्र रही है। यहां से वर्तमान विधायक बाबू जंडेल कांग्रेस पार्टी का प्रतिनिधित्व करते हैं। एक साधारण किसान परिवार से निकलकर उन्होंने अपनी मेहनत और जनसमर्पण के बल पर राजनीति में पहचान बनाई।
प्रारंभिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि
बाबू जंडेल का जन्म मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले के सोनथवा गाँव में हुआ। उनका परिवार कृषक वर्ग से जुड़ा है और पारंपरिक रूप से खेती-बाड़ी पर आश्रित रहा है।
उनकी पत्नी का नाम रामसिया बाई है। परिवार में उनके दो पुत्र और एक पुत्री हैं। ग्रामीण परिवेश से जुड़ाव ने ही उन्हें लोगों की तकलीफ़ें करीब से समझने का अवसर दिया।
राजनीतिक सफर की शुरुआत
उनका राजनीतिक सफर गांव की पंचायत से शुरू हुआ।
1994 में, बाबू जंडेल पहली बार अपने ही गाँव सोनथवा के ग्राम पंचायत सरपंच बने।
सरपंच रहते हुए उन्होंने ग्रामीण समस्याओं जैसे—पेयजल, सड़क, और किसानों की ज़रूरतों पर ध्यान दिया।
यहीं से उन्होंने जनसेवा और नेतृत्व का अनुभव प्राप्त किया।
विधानसभा तक का सफर
बाबू जंडेल ने कांग्रेस पार्टी से जुड़कर अपने राजनीतिक दायरे को बढ़ाया।
2018 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने श्योपुर सीट से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा। इस चुनाव में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (BJP) के उम्मीदवार को बड़े अंतर से हराया। उन्हें लगभग 98 हज़ार वोट मिले और करीब 41 हज़ार से ज्यादा वोटों से जीत दर्ज की।
2023 के विधानसभा चुनाव में भी वे श्योपुर से कांग्रेस प्रत्याशी बने। इस बार उनका मुकाबला बीजेपी के दुर्गालाल विजय से हुआ। मुकाबला कड़ा रहा, लेकिन बाबू जंडेल ने करीब 11 हज़ार वोटों से जीत हासिल की और दूसरी बार विधायक बने।
लगातार दो बार की जीत ने यह साबित कर दिया कि श्योपुर क्षेत्र में उनकी लोकप्रियता और जनाधार मजबूत है।
योगदान और कार्य
श्योपुर जिले का अधिकांश हिस्सा आदिवासी और ग्रामीण बहुल है। यहां विकास की कई चुनौतियाँ रही हैं। विधायक बनने के बाद बाबू जंडेल ने कई मुद्दों पर आवाज़ उठाई—
क्षेत्र में सिंचाई और पानी की समस्या।
युवाओं के लिए रोजगार की ज़रूरत।
आदिवासी और किसान समुदाय के अधिकार।
शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार।
विधानसभा और जनसभाओं में वे इन विषयों को अक्सर उठाते रहे हैं।
विवाद और चर्चाएँ
राजनीति में सक्रिय रहते हुए वे कई बार विवादों में भी आए-
2023 में, उन पर एक महिला पुलिस अधिकारी के प्रति आपत्तिजनक भाषा के इस्तेमाल का आरोप लगा और FIR दर्ज की गई।
2024 में, भगवान शिव को लेकर की गई टिप्पणी का वीडियो वायरल हुआ, जिस पर विपक्ष ने कड़ी प्रतिक्रिया दी।
चुनावी मंचों पर कभी-कभी उनकी भावनात्मक प्रतिक्रिया और नाराज़गी भी सुर्खियों में रही, जैसे—सभा में कुर्सी न मिलने पर ज़मीन पर बैठ जाना।
इन विवादों के बावजूद वे अपने क्षेत्र में लोकप्रिय नेता बने हुए हैं।
व्यक्तिगत छवि
बाबू जंडेल की पहचान एक जमीनी नेता के रूप में है। वे सीधे लोगों से जुड़ते हैं और अक्सर गांव-गांव जाकर समस्याएँ सुनते हैं। उनका राजनीतिक अंदाज़ सरल और आम जनता से जुड़ा हुआ माना जाता है।
श्योपुर के विधायक बाबू जंडेल का राजनीतिक सफर यह दर्शाता है कि कैसे एक ग्राम पंचायत के सरपंच से कोई व्यक्ति विधानसभा तक पहुंच सकता है। 1994 में पंचायत की राजनीति से शुरुआत करके उन्होंने दो बार लगातार विधायक बनकर अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत की है। विवादों और आलोचनाओं के बावजूद वे अपने क्षेत्र में जनसेवा और जनता के मुद्दों पर मुखर रहते हैं।
बाबू जंडेल आज श्योपुर जिले की राजनीति का अहम चेहरा हैं और आने वाले समय में उनकी भूमिका प्रदेश की राजनीति में और भी महत्वपूर्ण हो सकती है।
