रिपोर्ट, काजल जाटव: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत के रूस से तेल खरीदने पर 50% का टैक्स लगाने की कोशिश की थी, लेकिन यह पूरी तरह से फेल होती दिख रही है। यह कदम, जिसका मकसद था भारत को रूस से तेल खरीदने से रोकना, उल्टा ही काम कर रहा है। भारतीय रिफाइनरियां भारी टैक्स के बावजूद रूस का सस्ता कच्चा तेल खरीदती जा रही हैं, जो न सिर्फ भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए जरूरी है बल्कि उसकी विदेश नीति में भी दम भरने का मौका देता है।

आर्थिक समीकरण

रूस पर पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद, मॉस्को ने अपने कच्चे तेल पर भारी छूट देना शुरू कर दी है। यूरेस क्रूड अब इंटरनेशनल मार्केट ने ब्रैंट की तुलना में लगभग $3–4 प्रति बैरल सस्ता मिल रहा है। यह कीमत का फर्क भारत के लिए बड़ा प्रोत्साहन बन गया है। भारतीय रिफाइनरियों ने इसमें से फायदा उठाते हुए, एक हफ्ते में ही करीब 1.14 करोड़ बैरल रूसी तेल खरीदा। साफ है कि सस्ता तेल पर मिल रही ये बचत अमेरिकी टैक्स से होने वाले खर्च से कहीं ज्यादा है।

भारत ने हमेशा कहा है कि उसकी रूस से तेल खरीदना न केवल कानूनी है, बल्कि दुनिया में तेल की कीमतें स्थिर करने में भी जरूरी है। अगर भारत जैसे बड़े खरीदार रशियन तेल नहीं खरीदेंगे, तो संभव है कि ग्लोबल तेल सप्लाई प्रभावित हो जाए, जिससे कीमतें बढ़ सकती हैं, और ये दुनिया की कमजोर अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर डाल सकता है। भारत का मानना है कि वह किसी भी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध का उल्लंघन नहीं कर रहा है, और उसकी जिम्मेदारी अपने 1.4 अरब लोगों के ऊर्जा सुरक्षा की रक्षा करना है।

रणनीतिक संतुलन और भू-राजनीतिक चालें

भारत का यह समीकरण सिर्फ आर्थिक आंकड़े नहीं बल्कि विश्व मंच पर अपनी स्वतंत्रता का एक रणनीतिक संदेश है। नई दिल्ली ने यह साफ कर दिया है कि वह बाहरी दबाव के आगे नहीं झुकेगा और अपनी विदेश नीति को अपने राष्ट्रीय हितों के हिसाब से ही चलाएगा। इसमें रूस के साथ लंबे समय से रक्षा और ऊर्जा में साझेदारी बनाए रखना भी शामिल है।

यह आजादी रणनीतिक स्तर पर विशेष रूप से शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन में भी दिखाइ दी। जबकि अमेरिका अक्सर भारत को चीन के तेजी से बढ़ते प्रभाव के खिलाफ एक संभावित हथियार मानता रहा है, भारत ने इस सम्मेलन में मॉस्को और बीजिंग दोनों के साथ अपनी सहभागिता से एक सूझबूझ भरी छवि बनाई। नई दिल्ली अपने संबंधों को संतुलित करने की कोशिश कर रही है, यह दिखाते हुए कि वह अमेरिकी खेल का सिर्फ एक खिलाड़ी नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र रणनीतिक शक्ति है।

भारतीय सरकार ने टैरिफ लगाने का फैसला किया है, जो अनजाने में उसे उन शक्तियों के करीब ले आया है जिन्हें अमेरिका नियंत्रित करना चाहता है। विशेषज्ञों ने इस कदम की आलोचना करते हुए कहा है कि यह एक राजनैतिक गलती हो सकती है, जो या तो एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदारी को अलग कर सकती है। अमेरिकी इन टैरिफ को अपनाकर भारत के साथ संबंध मजबूत करने के वर्षों के प्रयासों को कमजोर कर रहे हैं, खासकर चीन जैसी ताकतों के साथ व्यवहार में।

भविष्य मे क्या?

यह व्यापार में तनाव अमेरिका-भारत के भविष्य के रिश्तों पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। कुछ अमेरिकी अधिकारियों ने कहा है कि रूस पर दबाव डालने के लिए ये शुल्क जरूरी हैं, लेकिन इससे द्विपक्षीय व्यापार चर्चाओं पर दबाव भी पड़ा है और यह कहीं बड़ा व्यापार युद्ध भी खड़ा कर सकता है। भारतीय निर्यातकों के लिए यह अनिश्चितता का दौर है, जिससे खासतौर पर कपड़ा, रत्न और चमड़े के सामान जैसे सेक्टर प्रभावित हो सकते हैं।

वहीं, भारत की रूसी तेल की खरीद पर अपना स्थिर रुख ये दिखाता है कि उसकी विदेश नीति पूरी तरह से रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित है। जैसी दुनिया अपने बहुध्रुवीय युग की ओर बढ़ रही है, वहां भारत खुद को ग्लोबल साउथ का नेता बना रहा है, जो बिना किसी एक ब्लॉक के बंधे, जटिल भू-राजनीतिक हालात में खुद को ढाल रहा है। तेल पर अमेरिकी शुल्क का कदम भारत के आत्मविश्वास को मजबूत करता दिख रहा है, रूस के साथ अपने संबंधों को और गहरा कर रहा है, और अपनी शर्तों पर, चीन सहित अन्य साझेदारों के साथ सहयोग का संकेत भी दे रहा है।

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