बिहार विधानसभा चुनाव 2025 केवल प्रदेश के मुख्यमंत्री का फैसला नहीं करेगा, बल्कि दिल्ली की सत्ता को भी हिला सकता है। नीतीश कुमार की चाल और चंद्रबाबू नायडू की रणनीति तय करेगी कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार सुरक्षित रहेगी या फिर देश एक बार फिर गठबंधन की अस्थिर राजनीति का गवाह बनेगा।

बिहार चुनाव के नतीजे बदल सकते हैं केंद्र की राजनीति: NDA सरकार पर संकट के बादल
बिहार विधानसभा चुनाव केवल प्रदेश की सियासत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर सीधे दिल्ली की सत्ता पर भी पड़ सकता है। मौजूदा समय में केंद्र में NDA (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) के पास कुल 293 सीटें हैं।

इनमें से अकेले भारतीय जनता पार्टी (BJP) की हिस्सेदारी 240 सीटों की है। वहीं, INDIA गठबंधन के पास 234 सीटें हैं, जिनमें कांग्रेस (99), समाजवादी पार्टी (37), तृणमूल कांग्रेस (29) समेत कई सहयोगी दल शामिल हैं। इसके अलावा 15 सीटें निर्दलीय या अन्य सांसदों के पास हैं।
बिहार का समीकरण

बिहार विधानसभा (243 सीटें) में इस समय NDA और INDIA के बीच कड़ा मुकाबला है।
अनुमानित आंकड़े कुछ इस प्रकार:
NDA : BJP 80, JDU 45, HAM(से.) 4, अन्य 2
INDIA : RJD76, INC19, CPI(ML) 11, CPI(M) 2, CPI 2, अन्य 1

यानी अगर INDIA गठबंधन बेहतर प्रदर्शन करता है और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद पर बने रहने के लिए NDA से किनारा कर INDIA से हाथ मिला लेते हैं, तो केंद्र में भी समीकरण बदल सकता है।
नीतीश के जाने के बाद NDA कमज़ोर और अस्थिर हो जाएगा, और अगर नायडू जैसे सहयोगी भी पाला बदल लें, तो मोदी सरकार गिर सकती है।

अगर बिहार में नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद नहीं मिलता और INDIA उन्हें केंद्र में बड़ा पद ऑफर करता है, तो उनके NDA छोड़ने की संभावना मज़बूत है। ये कदम अकेले सरकार नहीं गिराएगा, लेकिन NDA को इतनी कमजोर कर देगा कि सरकार का टिकना पूरी तरह चंद्रबाबू नायडू जैसे सहयोगियों की दया पर होगा।
नीतीश और चंद्रबाबू नायडू पर टिकेगी बाज़ी
यदि जदयू NDA से अलग होता है, तो NDA की लोकसभा सीटें 293 से घटकर करीब 281 तक आ सकती हैं। ऐसे में सरकार का बहुमत सिर्फ सहयोगी दलों पर टिक जाएगा।

इस स्थिति में तेलुगु देशम पार्टी (TDP) प्रमुख चंद्रबाबू नायडू, जिनके पास 16 सांसद हैं, केंद्र सरकार की डोर थामने वाले सबसे अहम खिलाड़ी साबित होंगे। सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस और INDIA गठबंधन नायडू को बड़ा पद—जैसे गृह मंत्री या यहां तक कि प्रधानमंत्री पद—की पेशकश कर सकते हैं।
प्रशांत किशोर की भूमिका अहम मानी जा रही है।

इस पूरे समीकरण में जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर (PK) भी अहम फैक्टर माने जा रहे हैं। PK पहली बार बिहार की सभी 243 सीटों पर चुनावी तैयारी कर रहे हैं। यदि वे NDA के वोट बैंक को काटते हैं, तो बिहार में INDIA गठबंधन की स्थिति और मजबूत हो सकती है।
क्या दोहराई जाएगी चौधरी चरण सिंह की कहानी?

राजनीतिक पंडित मानते हैं कि, यदि NDA का आंकड़ा 272 के जादुई नंबर से नीचे आता है, तो केंद्र सरकार पर संकट तय है। 1979 में ठीक ऐसा ही हुआ था, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह बहुमत साबित नहीं कर पाए और सरकार गिर गई थी। आज का परिदृश्य भी कुछ वैसा ही बन सकता है—जहां गठबंधन राजनीति और छोटे दलों की चाबी से दिल्ली की गद्दी तय होगी।
1977 लोकसभा चुनाव (इमरजेंसी के बाद)

कुल सीटें: 542
बहुमत का आंकड़ा: 272
परिणाम इस प्रकार थे:
जनता पार्टी गठबंधन → 298 सीटें
जनता पार्टी (ज्यादा सीटें उत्तर भारत से मिलीं)

कांग्रेस (इंदिरा गांधी) → 153 सीटें (भारी हार)
लेफ्ट पार्टियां (CPI, CPI(M)) → लगभग 30–40 सीटें
DMK, AIADMK, अन्य क्षेत्रीय दल व निर्दलीय → बाकी सीटें
मोरारजी देसाई सरकार (1977–1979)
जनता पार्टी ने सरकार बनाई।
मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने।

लेकिन जनता पार्टी के भीतर गुटबाज़ी शुरू हो गई—
एक गुट चौधरी चरण सिंह (लोकदल) का
दूसरा गुट मोरारजी देसाई–जनसंघ–सोशलिस्ट नेताओं का 1979 में ये लड़ाई इतनी बढ़ी कि मोरारजी देसाई को इस्तीफ़ा देना पड़ा। चौधरी चरण सिंह सरकार (जुलाई 1979) मोरारजी के इस्तीफ़े के बाद, चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बने। उनके पास लोकसभा में बहुमत नहीं था। सरकार चलाने के लिए उन्होंने इंदिरा गांधी की कांग्रेस (153 सीटें) से समर्थन लेने का समझौता किया।
कांग्रेस ने क्यों समर्थन वापस लिया?

चौधरी चरण सिंह ने प्रधानमंत्री बनने के बाद इंदिरा गांधी और उनके बेटे संजय गांधी पर इमरजेंसी काल की जांच शुरू करने की योजना बनाई। इंदिरा गांधी इससे नाराज़ हो गईं और सपोर्ट वापस ले लिया। चौधरी चरण सिंह 20 अगस्त 1979 को बहुमत साबित करने से पहले ही इस्तीफ़ा देने को मजबूर हो गए।
नतीजा क्या हुआ था ?

चौधरी चरण सिंह सिर्फ 23 दिन प्रधानमंत्री रहे।
1980 में लोकसभा चुनाव हुए।
कांग्रेस (इंदिरा गांधी) ने भारी जीत हासिल की:
कांग्रेस: 353 सीटें जनता पार्टी टूटकर बुरी तरह हार गई।

1977 में जनता पार्टी ने 298 सीटें जीतकर सरकार बनाई। 1979 में गुटबाज़ी से सरकार टूटी और चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बने। उनके पास केवल 60–65 सांसदों का समर्थन था, बाकी कांग्रेस (153) पर निर्भर थे। जब कांग्रेस ने समर्थन वापस लिया, तो सरकार गिर गई। 1980 में चुनाव हुए और कांग्रेस 353 सीटों के साथ सत्ता में लौट आई।

यही आशंका आने वाले अक्टूबर नवंबर बिहार विधानसभा की राजनीति में भी देखी जा रही है। अगर NDA का बहुमत कमजोर हुआ और सहयोगी दल (जैसे JD(U), TDP) समर्थन वापस ले लें, तो मोदी सरकार भी चौधरी चरण सिंह की तरह मुश्किल में आ सकती है।
