ऋषिता गंगराडे़
समाज में दहेज प्रथा की काली छाया एक बार फिर सामने आई है। नेहा (काल्पनिक नाम), जिसने शादी के बाद नए सपनों के साथ अपना जीवन शुरू किया था, आज दहेज की भेंट चढ़ गई। उसके ससुराल वालों की मांगें लगातार बढ़ती रहीं और अंततः मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न का शिकार होकर उसकी मौत हो गई।
मामले की सच्चाई
नेहा के परिवार के मुताबिक शादी के बाद से ही ससुराल वाले कार और नकद पैसे की मांग कर रहे थे। मांग पूरी न होने पर उसे बार-बार प्रताड़ित किया गया। परिजनों ने बताया कि नेहा कई बार रोते हुए मायके आई और अपनी पीड़ा बताई। पुलिस ने ससुराल पक्ष पर धारा 304-बी (दहेज हत्या) और 498-ए (क्रूरता) के तहत मामला दर्ज कर लिया है।
दहेज प्रथा – एक सामाजिक अभिशाप
नेहा की मौत केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि पूरे समाज के सामने एक करारा सवाल है कि क्यों आधुनिक शिक्षा और कानूनों के बावजूद दहेज जैसी कुप्रथा खत्म नहीं हो पा रही है। आज भी कई महिलाएँ दहेज की मांग पूरी न कर पाने की वजह से मौत को गले लगाने पर मजबूर हो रही हैं।
जरूरत है सामाजिक जागरूकता की
इस घटना से यह स्पष्ट है कि केवल कानून बनाना काफी नहीं है। ज़रूरत है कि समाज मिलकर इस कुप्रथा के खिलाफ आवाज़ बुलंद करे। हर परिवार को अपनी बेटियों को दहेज नहीं बल्कि सम्मान और अधिकार देना चाहिए।
