रिपोर्ट, काजल जाटव: भारत तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के तौर पर ऊर्जा की खपत में भी सबसे आगे है। ऐसे में, तेल और गैस जैसे संसाधनों की आपूर्ति उसकी आर्थिक मजबूती और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों के लिए बहुत जरूरी हैं। हाल ही में भारत के रूस में अपने दूतावास ने साफ कहा कि भारत अपने ऊर्जा सुरक्षा के मामले में व्यावहारिक रुख अपनाता है और वही से तेल खरीदेगा जहां सबसे अच्छा सौदा मिलेगा। इस बयान से पता चलता है कि भारत अपनी स्वतंत्र और हितों के आधार पर विदेश नीति चला रहा है।
रूस से भारत का ऊर्जा संबंध
पिछले कई सालों से रूस भारत का भरोसेमंद साथी रहा है। दोनों के बीच ऊर्जा सहयोग दशकों पुराना है। खासकर यूक्रेन युद्ध के बाद जब पश्चिमी देश रूस पर पाबंदियां लगाते हैं, तब भारत ने सस्ते दामों पर रूस से भारी मात्रा में कच्चा तेल खरीदा। इससे न केवल भारत की ऊर्जा जरूरतें पूरी हुईं, बल्कि घरेलू मार्केट में पेट्रोल और डीजल की कीमतें भी स्थिर रहीं। आंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के इस कदम पर चर्चा हुई। कई पश्चिमी देशों ने सवाल उठाए कि भारत रूस से तेल खरीदकर अपने कदम से युद्ध को वित्तपोषित कर रहा है। लेकिन भारत ने हमेशा ये कहा है कि उसका मुख्य मकसद अपनी जनता और अर्थव्यवस्था का हित है।
“राष्ट्रीय हित सर्वोपरि” की नीति
रूस में भारत के दूत ने यह भी दोहराया कि भारत अपने ऊर्जा खरीद के फैसले अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर ही लेगा। उन्होंने कहा, “भारत का सिद्धांत सरल है – हम जहां सबसे अच्छा सौदा मिलेगा वहां से तेल खरीदेंगे।”
यह साफ संदेश है कि भारत वैश्विक दबाव से ऊपर उठकर अपने आर्थिक हितों को प्राथमिकता देगा। यह नीति ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की सोच से भी मेल खाती है। शीत युद्ध के दिनों से लेकर आजतक, भारत ने अपने विदेश नीति के फैसलों में स्वतंत्रता बनाए रखी है। चाहे रूस से तेल खरीदना हो, अमेरिका के साथ रक्षा संबंध मजबूत करना या खाड़ी देशों से ऊर्जा लाना, भारत ने हमेशा संतुलित और बहुपक्षीय दृष्टिकोण अपनाया है।
बढ़ती ऊर्जा जरूरतें
भारत की जनसंख्या और औद्योगिक विकास के कारण आने वाले वर्षों में तेल और गैस की मांग और भी बढ़ेगी। आज भारत तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है, जहां 85% से अधिक कच्चे तेल का आयात किया जाता है। इस वजह से तेल की कीमतें सीधे भारत की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती हैं। रूस से कम कीमत पर तेल खरीदने से भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम होता है। साथ ही, इससे देश की ऊर्जा विविधता भी मजबूत होती है। भारत केवल रूस पर निर्भर नहीं है, बल्कि सऊदी अरब, इराक, यूएई, अमेरिका और कई अफ्रीकी देशों से भी तेल मंगवाता है।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य
रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद, तेल का अंतरराष्ट्रीय व्यापार नई दिशा में गया है। भारत और चीन जैसे बड़े आयातक देशों ने इस मौके का फायदा उठाया है, और सस्ते तेल को खरीदकर अपनी ऊर्जा सुरक्षा मजबूत की है। वहीं, पश्चिमी देशों को रूस पर दबाव बनाने में उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिली।
भारत का ये कदम दिखाता है कि ऊर्जा सुरक्षा किसी भी देश के लिए सबसे महत्वपूर्ण होती है, इसके आगे कोई भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति नहीं आ पाती। यह भी साफ करता है कि भारत अपने फैसले स्वयं लेता है और किसी भी दबाव में नहीं झुकेगा।
