ऋषिता गंगराडे़

मध्यप्रदेश के खरगोन जिले के झिरनिया में इस वर्ष जन्माष्टमी का पर्व बेहद धूमधाम से मनाया गया। क्षेत्र में निकला श्रीकृष्ण डोला लोगों के आकर्षण का मुख्य केंद्र रहा। गाँव-गाँव और शहर-शहर से श्रद्धालु बड़ी संख्या में इस आयोजन में शामिल हुए। अनुमान लगाया जा रहा है कि इस डोले को देखने और इसमें शामिल होने के लिए लाखों की भीड़ उमड़ी। पूरे क्षेत्र का माहौल भक्ति और उत्साह से सराबोर दिखाई दिया।

डोले के मार्ग में जगह-जगह खाने-पीने के स्टॉल लगाए गए थे। मेले जैसा वातावरण था, बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी लोग इसमें शामिल हुए। यह आयोजन निश्चित रूप से आस्था और परंपरा की गहरी जड़ों को दिखाता है। लेकिन भीड़ के साथ-साथ एक बड़ा सवाल भी उठ खड़ा हुआ—क्या यह सचमुच भगवान श्रीकृष्ण को याद करने का सही तरीका है?

डोले में जहाँ भक्ति-भाव के भजन गाए जाने चाहिए थे, वहीं अधिकांश जगह फिल्मी गीतों और डीजे की धुनों पर नाच-गाना देखने को मिला। युवा वर्ग से लेकर बुजुर्ग तक कई लोग डांस और मनोरंजन में मशगूल रहे। धार्मिक आयोजन कहीं-कहीं मनोरंजन और आधुनिकता की भेंट चढ़ते नज़र आए।

असली संदेश क्या है?

जन्माष्टमी केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि यह भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का पावन पर्व है। इसका उद्देश्य हमें उनके जीवन से जुड़े आदर्शों और शिक्षाओं को याद दिलाना है। श्रीकृष्ण ने गीता के माध्यम से मानवता को धर्म, कर्तव्य और प्रेम का संदेश दिया। लेकिन जब उनका जन्मोत्सव केवल भीड़, शोर-शराबा और फिल्मी धुनों का मंच बनकर रह जाए, तो यह उनके संदेश से भटकने जैसा लगता है।

विकल्प और सुधार

यदि जन्माष्टमी जैसे अवसर पर भजन संध्या, रासलीला, श्रीकृष्ण जन्म का नाट्य मंचन, झाँकियाँ और सत्संग आयोजित किए जाएँ तो समाज को अधिक लाभ हो सकता है। इससे नई पीढ़ी को भी श्रीकृष्ण की लीलाओं से परिचित कराया जा सकता है। सामूहिक रूप से भजन-कीर्तन, मंदिरों में झाँकी सजाना और रात 12 बजे जन्मोत्सव मनाना ही असल परंपरा का प्रतीक है।

समाज को संदेश

झिरनिया का यह आयोजन निश्चित रूप से आस्था और उत्साह का अद्भुत उदाहरण है, लेकिन साथ ही यह भी सोचने की आवश्यकता है कि कहीं हम भगवान को याद करने का तरीका चुनते समय उनकी आध्यात्मिक भावना से तो नहीं भटक रहे।

भीड़ और भव्यता आवश्यक हैं, लेकिन इनके साथ-साथ भक्ति, श्रद्धा और मर्यादा भी उतनी ही ज़रूरी हैं।यदि आने वाले वर्षों में इन आयोजनों को अधिक धार्मिक और सांस्कृतिक स्वरूप में ढाला जाए तो जन्माष्टमी न केवल मेले जैसा उत्सव होगी, बल्कि वास्तव में भक्ति और समाज को जोड़ने वाला पर्व बन पाएगी।

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