रानू यादव
बिहार में चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) प्रक्रिया लगातार विवादों में है। विपक्ष इसपर सवाल खड़े कर रहा है कि इस प्रक्रिया के तहत चुनाव आयोग कई मतदाताओं को सूची से बाहर कर रहा है। वहीं, अब चुनाव आयोग ने इसपर सुप्रीम कोर्ट में जवाब दिया है।
चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में बताया कि बिहार में किसी भी मतदाता से उसका अधिकार नहीं छीना गया है। नोटिस दिए बिना किसी भी मतदाता को वोटर लिस्ट से बाहर नहीं किया जाएगा।
मतदाता सूची से 65 लाख लोगों के नाम काटने पर चुनाव आयोग का जवाब?
बिहार मतदाता सूची विशेष सघन पुनरीक्षण (एसआइआर) मामले में चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में जवाब दाखिल कर कहा है कि बिहार में प्रारूप मतदाता सूची से बिना पूर्व सूचना, सुनवाई का अवसर और तर्कपूर्ण आदेश जारी किये बगैर किसी भी मतदाता का नाम नहीं हटाया जाएगा।
हाल ही में बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान मतदाता सूची से 65 लाख से अधिक नाम हटाए जाने का मामला सामने आया है। इस संबंध में, भारत के चुनाव आयोग (ECI) ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर किया है, जिसमें कई बातें कही गई हैं।
आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को आश्वासन दिया है कि 1 अगस्त 2025 को प्रकाशित मसौदा मतदाता सूची से किसी भी मतदाता का नाम बिना पूर्व सूचना, सुनवाई का अवसर और एक उचित आदेश के बिना नहीं हटाया जाएगा।
इसके अलावा चुनाव आयोग ने कहा है कि नाम हटाने का कारण मतदाता को बताया जाएगा और उसे अपनी बात रखने का मौका भी दिया जाएगा।आयोग ने यह भी कहा कि उसने यह सुनिश्चित करने के लिए हर संभव कदम उठाया है कि कोई भी योग्य मतदाता छूट न जाए। इसके लिए दो-स्तरीय अपील की व्यवस्था भी बनाई गई है।
चुनाव आयोग ने कहा कि वह ड्राफ्ट मतदाता सूची में शामिल नहीं किए गए लोगों की अलग से सूची प्रकाशित करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं है और न ही कानून में इसके लिए कोई प्रावधान है। आगे आयोग ने बताया कि उसने राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के साथ बूथ-स्तर पर उन मतदाताओं की सूची साझा की है जिनके नामांकन प्रपत्र प्राप्त नहीं हुए थे, ताकि उन्हें उन मतदाताओं तक पहुंचने में मदद मिल सके।
आयोग के अनुसार, हटाए गए नामों में 22 लाख मृत व्यक्ति, 36 लाख ऐसे लोग हैं जो या तो स्थायी रूप से पलायन कर गए हैं या मिल नहीं रहे हैं, और बाकी 7 लाख ऐसे लोग हैं जिनके नाम एक से ज्यादा जगहों पर दर्ज हैं।
हलफनामे के अनुसार, मतदाता सूची से नाम हटाने के मुख्य कारण इस प्रकार हैं:
मृत्यु: लगभग 22 लाख मतदाताओं के नाम उनकी मृत्यु के कारण हटाए गए।
स्थानांतरण (माइग्रेशन): लगभग 36 लाख लोग स्थायी रूप से किसी दूसरे स्थान या राज्य में चले गए थे।
डुप्लीकेट नाम: करीब 7 लाख मतदाताओं के नाम एक से अधिक स्थानों पर दर्ज थे।
याचिकाकर्ता अधिकार के तौर पर लिस्ट की मांग न करें: चुनाव आयोग हालांकि चुनाव आयोग ने जिन 65 लाख लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए हैं उनकी जानकारी सार्वजनिक तौर पर देने से इनकार किया है। आयोग ने कहा है कि न तो कानून में और न ही दिशा-निर्देशों में ये है कि जिन लोगों ने किसी भी कारण से गणना फार्म नहीं भरा है, उनकी सूची तैयार करके साझा की जाएगी, इसलिए याचिकाकर्ता अधिकार के तौर पर ऐसी किसी लिस्ट की मांग या दावा नहीं कर सकता।
राजनीति के विपक्षी दल की प्रतिक्रिया?
बिहार में मतदाता सूची से 65 लाख नाम हटाने के आरोपों पर विपक्षी दलों की कड़ी प्रतिक्रिया आई है।कांग्रेस नेता राहुल गांधी और सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने चुनाव आयोग पर “वोट चोरी” का आरोप लगाया है। योगेंद्र यादव ने इसे “चोरी नहीं, डकैती” बताया है, यह कहते हुए कि यह काम महाराष्ट्र और अन्य जगहों पर चोरी-छिपे हो रहा था, लेकिन बिहार में खुलेआम हो रहा है। पूर्व केंद्रीय मंत्री और विपक्षी नेता शत्रुघ्न सिन्हा ने इसे केंद्र सरकार की एक साजिश बताया है। उन्होंने आरोप लगाया कि मतदाता सूची के नियमों में बदलाव कर यह कदम इसलिए उठाया गया है ताकि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तेजस्वी यादव की लोकप्रियता को कम किया जा सके। विपक्षी दलों का कहना है कि चुनाव आयोग को इन आरोपों की जांच करनी चाहिए और हटाए गए मतदाताओं की पूरी सूची और उनके नाम हटाने के कारणों को सार्वजनिक करना चाहिए। नहीं तो इससे लोकतंत्र को खतरा हो सकता है।
निर्वाचन आयोग कार्यालय जाने के दौरान हिरासत में लिए गए सभी विपक्षी सांसद!
बिहार में मतदाता सूची में संशोधन और कथित ‘वोट चोरी’ के खिलाफ अपना विरोध जताने के लिए सोमवार को निर्वाचन आयोग के कार्यालय जाने के दौरान हिरासत में लिए गए सभी विपक्षी सांसदों को करीब दो घंटे बाद रिहा कर दिया गया। पुलिस अधिकारियों ने यह जानकारी दी। लोकसभा में विपक्ष के नेता एवं कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाद्रा, शिवसेना (उबाठा) नेता संजय राउत और तृणमूल कांग्रेस की सागरिका घोष समेत 30 से ज़्यादा सांसदों को हिरासत में लेकर संसद मार्ग थाने ले जाया गया।
प्रदर्शनकारी बड़ी संख्या में मौजूद थे!
अधिकारियों ने बताया कि निर्वाचन आयोग ने सिर्फ 30 सांसदों को ही अपने परिसर में प्रवेश की अनुमति दी थी, लेकिन प्रदर्शनकारी ‘बड़ी संख्या’ में थे। उन्होंने कहा कि इसके अलावा आयोग के कार्यालय तक विरोध मार्च के लिए कोई अनुमति नहीं ली गई थी। विभिन्न दलों के सांसदों ने संसद भवन से लगभग एक किलोमीटर दूर निर्वाचन आयोग के मुख्यालय तक विरोध मार्च शुरू किया था, लेकिन पुलिस ने भारी नाटकीय घटनाक्रम के बीच उन्हें बीच में ही रोक दिया।
