ऋषिता गंगराडे़

उत्तरकाशी एक बार फिर प्राकृतिक आपदा की चपेट में है। अगस्त 2025 की शुरुआत से लगातार हो रही भारी बारिश ने राज्य के कई जिलों में भयानक तबाही मचाई है। खासकर रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी, चमोली, पिथौरागढ़ और टिहरी जैसे पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन, नदी में आई बाढ़ और मकानों के ढहने की घटनाओं ने सैकड़ों परिवारों को उजाड़ दिया है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार अब तक लगभग 65 लोगों की मौत और 100 से ज्यादा लोग लापता बताए जा रहे हैं। लेकिन स्थानीय लोगों, पत्रकारों और राहत कार्य में जुटे एनजीओज़ का दावा है कि ये संख्या कहीं अधिक है – 200 से ज्यादा मौतों की आशंका जताई जा रही है। सवाल उठता है – क्या सरकार मौत के असली आंकड़े छुपा रही है?

सरकार पर लग रहे हैं आरोप

  • स्थानीय पत्रकारों और सोशल मीडिया रिपोर्ट्स में सामने आ रहा है कि कई गांवों में बाढ़ और भूस्खलन के कारण पूरी बस्तियां बह गई हैं, लेकिन इन क्षेत्रों की कोई आधिकारिक रिपोर्ट अब तक जारी नहीं हुई है।
  • रेस्क्यू ऑपरेशंस की धीमी रफ्तार और असमर्थ तैयारी को लेकर भी प्रशासन की आलोचना हो रही है।
  • कई मृतकों को उनके परिवारों ने खुद दफनाया या अंतिम संस्कार किया, क्योंकि प्रशासन समय पर नहीं पहुंच सका — ऐसे मामलों की कोई गिनती सरकारी रिकॉर्ड में नहीं है।
  • चमोली जिले के एक सरकारी अधिकारी के बयान (स्थानीय न्यूज़ पोर्टल पर प्रकाशित) के अनुसार, “हमें निर्देश मिला है कि केवल पुष्टि हुए मामलों को ही रिकॉर्ड करें, जबकि बहुत से गांवों तक अब तक पहुंच भी नहीं हो पाई है।”

क्यों छुपाए जा सकते हैं आंकड़े?

  • राज्य सरकार की छवि बनाए रखने के लिए, क्योंकि 2025 के अंत में विधानसभा चुनाव होने हैं।
  • राष्ट्रीय आपदा राहत कोष (NDRF) से मिलने वाली राशि और मुआवज़ा देने की प्रक्रिया को कम खर्चीला बनाने के लिए।
  • टूरिज्म सीज़न प्रभावित न हो, इसलिए सरकार नहीं चाहती कि उत्तराखंड को “आपदा-ग्रस्त राज्य” घोषित किया जाए।

जनता की मांग

  • स्वतंत्र जांच कमेटी का गठन हो।
  • सभी बाढ़ प्रभावित गांवों में ड्रोन सर्वे और सैटेलाइट इमेजिंग के जरिए सटीक आंकड़े सामने लाए जाएं।
  • लापता लोगों की पहचान और सूची जारी की जाए।
  • मृतकों के परिजनों को समुचित मुआवज़ा और मदद दी जाए।

उत्तराखंड की बाढ़ सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही और संवेदनहीनता का भी एक उदाहरण बनती जा रही है। यदि मौतों के आंकड़े सच में छिपाए जा रहे हैं, तो यह न केवल लोकतंत्र के साथ धोखा है, बल्कि उन सैकड़ों परिवारों के दर्द के साथ भी अन्याय है जिन्होंने अपनों को खोया है।

सवाल यह नहीं कि कितने लोग मरे, सवाल यह है – सरकार कितनों की जानों को गिनने लायक समझती है?

Source: ज़मीनी रिपोर्ट्स, स्थानीय मीडिया, और आपदा प्रबंधन विभाग के खुलासों के आधार पर

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *