ऋषिता गंगराडे़
भाजपा नेता से लेकर पंचायत तक
हालांकि चुनावी राजनीति, ग्रामीण पंचायत और पार्टी नेतृत्व में महिलाओं की संख्या बढ़ी है, लेकिन वास्तविक नेतृत्व की कुर्सियाँ अब भी पुरुषों के पास ही हैं। 2025 तक, लोकसभा में महिलाएं केवल 13–14% सांसद हैं और मंत्री परिषद में 5–6% तक महिलाएं होंगी |
स्थानीय स्तर पर पंचायतों में महिलाओं को 33% आरक्षण मिलने के बाद भी उनके पीछे पुरुष परिवारजनों का प्रभाव बना हुआ है, जैसे ‘प्रधानी पति’ स्वयं बैठते हैं या प्रत्याशी के घोषणापत्र पर पुरुषों की तस्वीरें अधिक प्रदर्शित होती हैं |
प्रमुख चुनौतियाँ और कारण
1. पार्टी स्तर पर टिकट वितरण में पक्षपात
महिलाओं को प्रमुख और ‘जीते जा सकने वाले’ निर्वाचन क्षेत्रों में टिकट देना अभी भी दुर्लभ है। सामान्यतः महिलाएं उन निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव लड़ती हैं जहाँ उनकी जीत की संभावना कम होती है|
2. राजनीतिक वंशवाद (Dynasty Politics)
जब महिलाएं राजनीति में आती हैं, तो अक्सर वे किसी राजनीतिक परिवार से जुड़ी होती हैं। उदाहरण के तौर पर, SP, TDP, DMK और RJD में लगभग 100% महिला प्रत्याशी वंशज होती हैं, जबकि BJP और कांग्रेस में 50‑55% महिलाएं राजनीतिक वंश की होती हैं|
इससे न केवल पार्टी में महिलाओं की विविधता सीमित रहती है, बल्कि उनके नेतृत्व कौशल की संभावनाएँ भी कम होती हैं।
3. संस्कृति और निजी मंच से दबाव
ग्राम पंचायतों और स्थानीय चुनावों में महिलाओं को आरक्षण मिलता है, परन्तु वास्तविक अभियान या निर्णय‑प्रक्रिया में अक्सर पुरुष परिवारजनों की प्रधानता रहती है। इससे आरक्षण का मूल उद्देश्य कमजोर पड़ता है |
4. न्यूनमत चयन और उम्मीदवारों की संख्या कम
पेर्टी वार्षिक टिकट देने में महिलाओं का हिस्सा सिर्फ 8‑9% रहता है। जबकि महिलाएं उम्मीदवार बनती हैं, उनके जीतने की दर पुरुषों की तुलना में कहीं अधिक होती है।
5. नीतिगत जिम्मेदारियाँ पुरुषों को अधिक मिलती हैं
महिला नेताओं को अक्सर ‘महिला कल्याण’, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे विभागों में नियुक्त किया जाता है। जबकि विदेश, रक्षा, वित्तीय मामलों में पुरुषों का वर्चस्व सबसे अधिक है |
उदाहरण: नाम ले कर दिखाने वाले नेता
ममता बनर्जी
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री — पहली महिला जिसने इस पद को इतने लंबे समय तक संभाला। आम आदमी दल की दिल्ली में मंत्री रही रेखा गुप्ता भी एक उल्लेखनीय उदाहरण हैं|
नीतिबद्ध पार्टी उदाहरण – Naam Tamilar Katchi (NTK)
तमिलनाडु की NTK ने 2019 व 2024 में 50% टिकट महिलाओं को दिए, जो भारतीय राजनीति में दुर्लभ था। इसके विपरीत बाकी बड़े दल (BJP, INC, DMK) महिलाओं को सिर्फ 14‑16% टिकट देते हैं|
महिला वोटरों की सक्रियता लेकिन प्रतिनिधित्व कम
2024 लोकसभा चुनाव में महिला मतदाताओं का प्रतिशत पुरुषों से थोड़ा अधिक (65.78%) था, लेकिन प्रतिनिधित्व में अंतर अभी भी बड़ा है (> 14%)|
समाधान और आगे का रास्ता
- महिला आरक्षण विधेयक (Women’s Reservation Bill): यह विधेयक 2023 में पारित हुआ, लेकिन इसे लागू होने में अभी 2029 तक का समय लग सकता है, क्योंकि इसके लिए नए जनगणना और परिसीमन की आवश्यकता है।
- पारटी अंदर अधिक महिला नेतृत्व स्थान: दूसरे देशों की तुलना में भारत अभी भी पीछे है। राजनीतिक दलों को महिला नेताओं को निर्णय‑प्रक्रिया में शामिल करना चाहिए, ताकि 50‑50 उम्मीदवार नीति पर अमल हो सके जैसे NTK ने किया|
- साक्षरता, आर्थिक स्वतंत्रता और जागरूकता संवर्धन:महिलाओं की शिक्षा, स्वरोजगार योजनाएं जैसे Stand‑Up India और स्वयं‑सहायता समूह (जो भाजपा ने महिला वोट बैंक को संबोधित करने में सक्रिय रूप से काम किया) – ये उपाय उनकी राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने में मदद करते हैं|
- स्थानीय राजनीति में वास्तविक भूमिका देना:ग्राम पंचायतों में निर्वाचित महिलाओं को अभियान और निर्णय लेने में दबंग रहने देना चाहिए — ना कि पुरुष ‘प्रधानी’ का नियंत्रण। प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि महिलाओं का नेतृत्व वास्तविक हो |
राजनीतिक दलों में महिलाओं की भागीदारी में सुधार हुआ है — वोटर turnout बढ़ा है, पंचायतों में आरक्षण मिला है, लेकिन दिल की कुर्सियाँ पुरुषों के पास हैं।
वास्तविक नेतृत्व बदलने के लिए जरूरत है:
- महिलाओं को प्रभावशाली निर्वाचन क्षेत्रों से टिकट देना,
- टिकट राजनीति में वंशवाद से ऊपर उठना,
- दलों में निर्णय‑लेने वाले पदों पर महिलाओं की नियुक्ति करना,
- और सामाजिक-सांस्कृतिक बाधाओं को दूर करना।
यह तभी संभव हो पाएगा जब महिलाएं सिर्फ प्रतीक न बनें, बल्कि निर्णय लेने वाली नेता बनें।
Source:-
- The times of India
- apnews.com
- wired.com
