रोहित रजक, भोपाल। देशभर में लगातार बढ़ती छात्र आत्महत्या की घटनाएं अब गंभीर चिंता का विषय बन चुकी हैं। खासकर कोचिंग हब बन चुके शहरों – कोटा, दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद, प्रयागराज जैसे स्थानों में छात्रों पर पढ़ाई का अत्यधिक दबाव, प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता का डर, और भविष्य को लेकर असमंजस की स्थिति उनके मानसिक स्वास्थ्य पर भारी पड़ रही है। ऐसे में छात्रों की मानसिक सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी:

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि कोचिंग संस्थानों, स्कूलों और शिक्षण संस्थानों में पढ़ाई के साथ-साथ छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य का भी पूरा ख्याल रखा जाना चाहिए। कोर्ट ने चिंता जताई कि आत्महत्या की बढ़ती घटनाएं शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगा रही हैं।

सरकार से मांगी रिपोर्ट:

कोर्ट ने केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को निर्देश दिए कि वे इस दिशा में कदम उठाएं और एक विस्तृत रिपोर्ट पेश करें। कोर्ट ने यह भी कहा कि सिर्फ कोचिंग संस्थानों को दोषी ठहराना समाधान नहीं है, बल्कि पूरी शिक्षा प्रणाली में बदलाव की जरूरत है।

मानसिक स्वास्थ्य के लिए दिशानिर्देश:

कोर्ट ने कहा कि सभी स्कूलों और कोचिंग सेंटर्स को मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े विशेषज्ञों की नियुक्ति करनी चाहिए। बच्चों के व्यवहार में आ रहे बदलावों को समझना और समय पर उनकी मदद करना बहुत जरूरी है। इसके लिए काउंसलिंग सेशन, योग और ध्यान जैसी गतिविधियों को अनिवार्य किया जाना चाहिए।

राज्य सरकारों की भूमिका:

राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में जहां कोचिंग सेंटर्स की भरमार है, वहां की सरकारों को विशेष सतर्कता बरतने के निर्देश दिए गए हैं। कोटा जैसे शहर जहां हर साल सैकड़ों छात्र आईआईटी और मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, वहां छात्रों की आत्महत्याओं की संख्या चिंताजनक रही है।

यूजीसी और शिक्षा मंत्रालय को जिम्मेदारी:

सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी (University Grants Commission) और शिक्षा मंत्रालय को निर्देश दिए कि वे ऐसी नीति बनाएं जिससे छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा की जा सके। कोर्ट ने कहा कि बच्चों पर सिर्फ अंकों का बोझ डालना उनके जीवन के साथ अन्याय है।

विशेषज्ञों की राय:

मनोचिकित्सकों का कहना है कि अभिभावकों को भी समझने की जरूरत है कि हर बच्चा आईआईटी या डॉक्टर बनने के लिए नहीं बना है। उन्हें बच्चों की रुचियों और मानसिक स्थिति के अनुसार ही आगे बढ़ने देना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट की यह पहल बहुत ही सकारात्मक और समय की मांग है। शिक्षा सिर्फ परीक्षा पास करने का माध्यम नहीं होनी चाहिए, बल्कि यह बच्चों के मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक विकास का आधार होनी चाहिए। उम्मीद की जा रही है कि सरकार और शैक्षणिक संस्थान मिलकर एक ऐसी नीति बनाएंगे जिससे हर छात्र मानसिक रूप से सुरक्षित महसूस करे और आत्महत्या जैसे खतरनाक कदम न उठाए।

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