रोहित रजक: नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक महिला आईपीएस अधिकारी को अपने पूर्व पति और ससुराल वालों पर झूठे मुकदमे दर्ज कराने पर फटकार लगाई है।
कोर्ट ने आदेश दिया है कि वह बिना शर्त सार्वजनिक माफी मांगे और यह माफीनामा राष्ट्रीय अखबारों के साथ-साथ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी प्रकाशित किया जाए। कोर्ट ने साफ कहा कि सरकारी पद का गलत इस्तेमाल कर झूठे केस दर्ज करवाना एक गंभीर अपराध है।
क्या है पूरा मामला ?
दिल्ली की एक महिला आईपीएस अधिकारी ने अपने पूर्व पति और उसके परिवार के खिलाफ कई झूठे क्रिमिनल केस दर्ज कराए थे। मामला वैवाहिक विवाद से जुड़ा था। अधिकारी ने न केवल क्रिमिनल केस दर्ज कराए, बल्कि तलाक, भरण-पोषण और घरेलू हिंसा के कई मुकदमे भी डाले।
इन झूठे मामलों के चलते उसके पति को 109 दिन और पिता को 103 दिन जेल में रहना पड़ा। जब मामले की जांच और सुनवाई हुई, तो कोर्ट को यह स्पष्ट हुआ कि महिला अधिकारी ने झूठे आरोप लगाए थे जिनका कोई साक्ष्य नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी:
सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस जेबी पारदीवाला की बेंच ने कहा,
“महिला अधिकारी ने अपने पद और अधिकार का दुरुपयोग किया। यह एक अत्यंत गंभीर बात है। न्यायपालिका इस तरह के गलत प्रयोग को सहन नहीं कर सकती।”
इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को दी गई सहमति
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को भी सही ठहराया जिसमें महिला को बिना शर्त माफी मांगने को कहा गया था। हाईकोर्ट ने पीड़ित पति को 1.5 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश भी दिया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा।
महिला अधिकारी और उसकी पृष्ठभूमि
महिला अधिकारी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले की रहने वाली है।
साल 2015 में उनकी शादी दिल्ली के एक व्यवसायी से हुई थी।
शादी के तीन साल बाद 2018 में दोनों अलग हो गए।
2022 में महिला को यूपी कैडर से ट्रांसफर कर दिल्ली कैडर में लाया गया था।
अधिकारी ने पति, ससुर, सास, जेठ और ननद पर अलग-अलग धाराओं में केस दर्ज करवाए थे।
मामले में फैमिली कोर्ट से लेकर क्रिमिनल कोर्ट तक में कई मुकदमे दायर किए गए।
सोशल मीडिया और प्रिंट मीडिया पर माफीनामा जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि महिला को बिना शर्त माफी मांगनी होगी और यह माफीनामा इन दो स्थानों पर जरूरी रूप से प्रकाशित हो:
- प्रिंट मीडिया:
कम से कम दो राष्ट्रीय अखबारों में
अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों भाषाओं में
माफीनामा का स्पष्ट और पूर्ण रूप से प्रकाशन होना चाहिए
- सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स:
फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब जैसे सोशल मीडिया पर माफीनामा अपलोड करना होगा
माफीनामा को कम से कम 3 महीने तक वहां मौजूद रखना होगा
कोर्ट का सख्त निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि माफीनामा को उसी तरह से प्रकाशित किया जाए जैसे साल 2018 में आरोप लगाए गए थे।
महिला अब पीड़ित पति और उसके परिवार के सदस्यों से संपर्क नहीं कर सकती।
कोर्ट ने यह भी कहा कि महिला की बेटी यदि पूर्व पति के घर रहना चाहे तो उस पर भी कोई बाध्यता नहीं होनी चाहिए।
क्या कहते हैं कानून विशेषज्ञ ?
कानून विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला मिसाल बनेगा। जब कोई सरकारी अधिकारी या प्रभावशाली व्यक्ति अपने पद का गलत इस्तेमाल कर कानून की आड़ में निजी दुश्मनी निकालने की कोशिश करता है, तो ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई जरूरी है।
इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह संदेश दिया है कि चाहे कोई भी हो – आम नागरिक या उच्च पदाधिकारी – कानून सभी के लिए समान है।
महिला अधिकारी को जो सजा मिली है, वह न केवल पीड़ितों को न्याय दिलाती है, बल्कि समाज में झूठे केस दर्ज करने वालों को भी चेतावनी देती है।
सम्बंधित निर्देश:
महिला अधिकारी को अपनी नौकरी बचाने के लिए भविष्य में ऐसा कोई कार्य न करने की चेतावनी दी गई है।
सोशल मीडिया पर माफीनामा न डालने या समय पर अखबारों में प्रकाशित न करने पर कोर्ट अवमानना की कार्यवाही कर सकता है।
इस तरह, न्यायपालिका ने एक बार फिर यह सिद्ध किया कि कानून का दुरुपयोग करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा, चाहे वह कोई भी हो।
