ऋषिता गंगराडे़
एक समय था जब पत्रकारिता को केवल पुरुषों का क्षेत्र माना जाता था, लेकिन अब यह तस्वीर तेजी से बदल रही है। खासकर भारत के छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में महिलाएं अब पत्रकारिता के मोर्चे पर डटकर खड़ी हैं। वे न सिर्फ सामाजिक मुद्दों की आवाज़ बन रही हैं, बल्कि ऐसे जोखिमभरे मामलों की रिपोर्टिंग भी कर रही हैं, जहां अक्सर पत्रकारों को जान का खतरा होता है।
झारखंड की मीना देवी: अखबार की नहीं, आवाज़ की पत्रकारिता
मीना देवी, झारखंड के गढ़वा जिले के एक छोटे से गांव से आती हैं। उन्होंने कभी स्कूल की चौखट नहीं देखी, लेकिन आज “खबर लहरिया” की एक प्रशिक्षित रिपोर्टर हैं। वे ग्रामीण महिलाओं के शोषण, पंचायत घोटालों, और स्थानीय पुलिस अत्याचार जैसे मुद्दों पर वीडियो रिपोर्टिंग करती हैं।मीना कहती हैं,
“शुरुआत में लोग हँसते थे, डराते थे, लेकिन जब हमने स्कूल में शौचालय न होने की रिपोर्ट बनाई और प्रशासन ने उसे बनवाया, तभी लोगों की नजर बदल गई।”
[Source: खबर लहरिया — https://khabarlahariya.org]
बांदा की सुनीता प्रजापति: दलित महिलाओं की आवाज़
उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र की सुनीता प्रजापति, ‘खबर लहरिया’ की एक और तेज़-तर्रार पत्रकार हैं। वे दलित समुदाय से आती हैं और बाल विवाह, घरेलू हिंसा, और महिला स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर रिपोर्टिंग करती हैं|
उनकी एक रिपोर्ट ने तब चर्चा बटोरी जब उन्होंने बांदा के एक प्राथमिक विद्यालय में मिड-डे मील में भेदभाव को उजागर किया। रिपोर्ट के बाद जिला प्रशासन को जांच के आदेश देने पड़े।

क्या कहता है डेटा?
- “रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स” की रिपोर्ट (2023) के अनुसार, भारत में ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में महिला पत्रकारों की संख्या में 17% की वृद्धि दर्ज हुई है।
- न्यूज़लॉन्ड्री और ओएक्सफैम इंडिया की 2022 की रिपोर्ट बताती है कि हिंदी मीडिया में महिला पत्रकारों की हिस्सेदारी अब भी कम है, लेकिन जमीनी स्तर पर फील्ड रिपोर्टिंग में महिलाओं की भागीदारी तेजी से बढ़ी है।
रुकना नहीं है…
ये महिला पत्रकार सिर्फ खबरें नहीं लिखतीं — वे समाज में बदलाव की बुनियाद रख रही हैं। कम संसाधनों, समाजिक रूढ़ियों और जोखिमों के बावजूद ये महिलाएं कैमरा उठाकर गांवों की गलियों से देश की सत्ता तक सवाल पहुँचा रही हैं।
आज जब मुख्यधारा मीडिया अक्सर TRP की दौड़ में उलझा होता है, तब इन महिलाओं की रिपोर्टिंग हमें ज़मीनी सच्चाई से जोड़ती है।
महिला सशक्तिकरण अब सिर्फ नीतियों तक सीमित नहीं रहा, वह अब माइक, कैमरे और कलम के ज़रिए बदलते भारत की आवाज़ बन चुका है। जब छोटे शहरों की महिलाएं पत्रकारिता में कदम रखती हैं, तो वे सिर्फ खबर नहीं बनातीं — वे बदलाव की शुरुआत करती हैं।
