रानू यादव। बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग ने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन करा रही है जिसकी वजह से राजनीति से लेकर कानूनी और वैधानिक सवाल उठ रहे हैं।

दरअसल, चुनाव आयोग ने 24 जून को एक आदेश जारी किया था, जिसके तहत बिहार के करीब आठ करोड़ मतदाताओं को मतदाता सूची में बने रहने के लिए 25 जुलाई तक ‘गणना फॉर्म’ भरकर जमा होगा। आयोग के निर्देश के मुताबिक, एक अगस्त को ड्राफ़्ट सूची जारी की जाएगी। इस सूची में उन्हीं लोगों के नाम शामिल होंगे जिन्होंने फॉर्म जमा किया है।

इस प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। चुनाव आयोग इसे वोटर लिस्ट को दुरुस्त करने की कवायद बता रहा है, जबकि विपक्ष का आरोप है कि यह नागरिकता की जांच की प्रक्रिया है, जो पिछले दरवाज़े से चलाई जा रही है। इस मामले में अगली सुनवाई 28 जुलाई को होगी। आइए जानते है मताधिकार और नागरिकता अलग होते हुए कैसे एक दूसरे से जुड़े है;

संविधान में मताधिकार के लिए कौन-सा प्रावधान है?
भारत के संविधान में अनुच्छेद 324 से 329 तक निष्पक्ष और पारदर्शी चुनावों का पूरा विवरण दिया हुआ है जिसने अनुच्छेद 324 ‘एक स्वतंत्र और स्वायत्त चुनाव आयोग की नियुक्ति’ की व्यवस्था करता है। वहीं अनुच्छेद 325 के अनुसार, किसी भी व्यक्ति को केवल धर्म, नस्ल, जाति या लिंग के आधार पर मतदाता सूची से बाहर नहीं रखा जा सकता है।

अनुच्छेद 326 सभी नागरिकों को, बिना किसी भेदभाव के, चुनाव में मतदान का अधिकार देता है। इसके तहत, कोई भी व्यक्ति, जिसकी उम्र मतदान की तारीख़ तक 18 वर्ष या उससे अधिक हो, और जिसे संविधान या किसी क़ानून के तहत अयोग्य घोषित नहीं किया गया हो, मतदाता के रूप में पंजीकरण करा सकता है।

इस विषय में संसद ने दो प्रमुख क़ानून पारित किए हैं;

1:जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 2 जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951
2:जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 16 किसी गैर-नागरिक को मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए अयोग्य बनाती है।

वहीं, धारा 19 के अनुसार मतदाता सूची में नाम जुड़वाने के लिए व्यक्ति की आयु कम से कम 18 वर्ष होनी चाहिए और उसे संबंधित निर्वाचन क्षेत्र का निवासी होना आवश्यक है।

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951

यह प्रावधान करता है कि किसी निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में शामिल प्रत्येक व्यक्ति को मतदान का अधिकार होगा। हालांकि, यह भी स्पष्ट किया गया है कि वो व्यक्ति यह अधिकार इस्तेमाल नहीं कर सकते जिन्हें 1950 के अधिनियम के तहत अयोग्य घोषित किया गया हो या जो जेल में बंद हों। इसी के साथ, संविधान का अनुच्छेद 327 संसद और राज्य विधानसभाओं को चुनाव संबंधी क़ानून बनाने का अधिकार प्रदान करता है इसमें मतदाता सूची तैयार करने और चुनावी क्षेत्रों के परिसीमन से जुड़े प्रावधान है।जबकि अनुच्छेद 329 चुनाव संबंधी मामलों में अदालतों के हस्तक्षेप कम करता है।

कैसे एक दूसरे से अलग है नागरिकता और मताधिकार?

वोट का अधिकार मौलिक अधिकार में आता है या नहीं, यह मुद्दा लंबे समय से चला आ रहा है।

नागरिकता:

नागरिकता किसी व्यक्ति के किसी देश का कानूनी सदस्य होने की स्थिति है। यह जन्म से , वंश से , पंजीकरण से या देशीयकरण से प्राप्त होती हो सकती है। एक नागरिक के पास उसे देश के सभी अधिकार और कर्तव्य होते हैं जिनमें रहने, काम करने और कई मामलों में मतदान करने का अधिकार भी शामिल है।

मताधिकार:

मतदान का अधिकार एक क़ानूनी अधिकार है जो किस नागरिक को चुनाव में वोट डालने की अनुमति देता है। भारत में, संविधान के अनुच्छेद 326 के अनुसार, 18 वर्ष से अधिक आयु का प्रत्येक भारतीय नागरिक,जो अन्यथा किसी कानून के तहत अयोग्य नहीं है , उसे मतदाता सूची में पंजीकृत होने और मतदान करने का हकदार है।

साल 2006 में कुलदीप नायर बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने कहा था कि मताधिकार सिर्फ़ एक संवैधानिक अधिकार में आता है, ना कि मौलिक अधिकार में

संविधान के अनुसार, मतदाता बनने के लिए भारत का नागरिक होना आवश्यक है, लेकिन हर भारतीय नागरिक स्वतः मतदाता नहीं होता, इसके लिए कई शर्तें पूरी करना ज़रूरी है।

आधार कार्ड को नागरिकता के प्रमाण से बाहर क्यों?

बिहार में चुनाव आयोग ने जो 11 दस्तावेज का जिक्र किया है उस लिस्ट में आधार कार्ड को नहीं रखा गया है। आम तौर पर हर जगह इन्हीं दस्तावेज का इस्तेमाल किया जाता है आखिर मतदाता सूची के लिए इसका इस्तेमाल क्यों नहीं किया जा रहा है।
चुनाव आयोग ने इस सवाल का जवाब अपने हलफनामे में दिया है कि अनुच्छेद 326 के हिसाब से आधार कार्ड योग्यता की जांच करने में मदद नहीं करता है। यह केवल पहचान का सबूत है ना कि नागरिकता का।

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