शिवानी यादव/ दिल्ली: पिछले करीब 80 वर्षों से एक ही मुद्रा ने वैश्विक व्यापार और राजनीति की दिशा तय की है और वह है अमेरिकी डॉलर। दुनिया की ज़्यादातर अर्थव्यवस्थाएँ डॉलर पर इतनी निर्भर हो गईं कि पेट्रोल खरीदने से लेकर कर्ज़ चुकाने तक, हर काम डॉलर में ही होता रहा। लेकिन अब इस तस्वीर में बदलाव आने लगा है। कई देश अब अमेरिकी डॉलर की बजाय अपनी मुद्रा या दूसरी वैकल्पिक मुद्राओं में व्यापार और निवेश करना चाहते हैं। इस आर्थिक बदलाव को कहा जाता है डि‑डॉलराइजेशन। यह एक नई आर्थिक क्रांति की शुरुआत मानी जा रही है। धीरे-धीरे ही सही, लेकिन यह दुनिया की सबसे ताकतवर मुद्रा को चुनौती देने लगा है।

इतिहास : डॉलर की बादशाहत कैसे बनी

डॉलर की कहानी शुरू हुई 1944 में ब्रेटन वुड्स समझौते से, जब द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था को स्थिर करने के लिए एक नई मौद्रिक व्यवस्था बनाई गई। इस समझौते के तहत अमेरिकी डॉलर को सोने के साथ जोड़ा गया और बाकी देशों की मुद्राएँ डॉलर के मुकाबले तय की गईं। हालांकि 1971 में अमेरिका ने डॉलर को सोने से अलग कर दिया, जोकि आने वाले समय में अमेरिका की सबसे बड़ी भूल साबित हो सकती है, मगर तब तक डॉलर की पकड़ इतनी मजबूत हो चुकी थी कि वह वैश्विक रिज़र्व मुद्रा बन गया। आज भी 80% अंतरराष्ट्रीय व्यापार और 60% विदेशी मुद्रा भंडार डॉलर में ही है। डॉलर की सर्वोच्चता सिर्फ आर्थिक नहीं थी, यह राजनीतिक शक्ति का भी प्रतीक बन गई थी।

डि‑डॉलराइजेशन क्यों शुरू हुआ?

हाल के वर्षों में कई घटनाओं ने देशों को डॉलर पर अपनी निर्भरता पर दोबारा सोचने को मजबूर किया:

1. अमेरिकी प्रतिबंध नीति

अमेरिका ने अपने राजनीतिक हितों की रक्षा के लिए रूस, ईरान, वेनेज़ुएला जैसे देशों पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए। इसका सीधा मतलब था ये देश अब डॉलर में व्यापार नहीं कर सकते। जिससे इन देशों ने नयी तकनीक अपनानी शुरू की।

2. डॉलर की छपाई और बढ़ता कर्ज़

अमेरिका ने कोविड-19 और अन्य संकटों के दौरान भारी मात्रा में डॉलर छापा, जिससे महंगाई और आर्थिक अस्थिरता बढ़ी। दुनिया को डर लगने लगा कि कहीं डॉलर का मूल्य गिर न जाए। अमेरिका के पास बाकी देशों की तरह रिजर्व में सोना नहीं है ना ही नोट छापाई पर कोई पाबंदी है।

3. भरोसे में गिरावट

अमेरिका की आंतरिक राजनीति में बढ़ते टकराव, बार-बार होने वाले डिफॉल्ट संकट और अस्थिर नीतियों ने अन्य देशों का भरोसा काफ़ी बार डगमगाया ।

डि‑डॉलराइजेशन की प्रक्रिया ?

अब डि‑डॉलराइजेशन सिर्फ विचार नहीं, बल्कि वास्तविकता बन चुका है। कई देश धीरे-धीरे इस दिशा में ठोस कदम उठा रहे हैं:

1. स्थानीय मुद्रा में व्यापार

भारत और रूस के बीच अब तेल और गैस का व्यापार रुपये और रूबल में हो रहा है।
चीन और ब्राज़ील जैसे देश युआन और रियाल में व्यापार बढ़ा रहे हैं।
भारत और UAE के बीच तो रुपये में कच्चा तेल खरीदने का सौदा भी हो चुका है।

2. करेंसी स्वैप समझौते

देश आपस में ऐसे समझौते कर रहे हैं जिससे वे एक-दूसरे की मुद्रा में लेन-देन कर सकें, बिना डॉलर के बीच में आए।

3. डिजिटल मुद्रा

चीन का e-CNY (डिजिटल युआन) और भारत का e₹ (डिजिटल रुपया) दुनिया को डिजिटल माध्यम से डॉलर से अलग करने की दिशा में बड़ा कदम हैं।

4. सोने पर आधारित मुद्रा की योजना

BRICS देशों (ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) ने एक गोल्ड-बैक्ड करेंसी पर चर्चा शुरू की है जो डॉलर को टक्कर दे सकती है।

5. विदेशी मुद्रा भंडार में विविधता

अब कई देश डॉलर की बजाय युआन, यूरो, सोना और दूसरी मुद्राओं को अपने रिज़र्व में शामिल कर रहे हैं।

डॉलर की गिरती पकड़ पर आंकड़े क्या दिखाते हैं?

  • 1999 में: डॉलर वैश्विक रिज़र्व का 71% हिस्सा था।
  • 2024 में: यह घटकर 58% रह गया है।
  • तेल व्यापार में भी युआन, यूरो और अन्य मुद्राओं की हिस्सेदारी बढ़ रही है।
  • IMF और SWIFT जैसे संगठन भी अब डॉलर के विकल्पों को पहचान देने लगे हैं।

अमेरिका के लिए खतरे की घंटी

डॉलर की ताकत के पीछे छुपा था अमेरिका का राजनीतिक और आर्थिक सर्वोच्चता। डि‑डॉलराइजेशन के बढ़ते कदम अमेरिका के लिए कई मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं, जैसे कि:

1. ऋण महंगा हो सकता है

अमेरिका को अपना सरकारी कर्ज बेचने के लिए ज्यादा ब्याज देना पड़ सकता है।

2. आर्थिक दबदबा कमजोर होगा

अगर डॉलर की मांग गिरेगी, तो अमेरिका की वैश्विक वित्तीय संस्थानों पर पकड़ भी कम होगी।

3. प्रतिबंधों की ताकत घटेगी

अमेरिका का सबसे बड़ा हथियार डॉलर आधारित प्रतिबंध अब उतना असरदार नहीं रहेगा।

भारत और अन्य देशों के लिए क्या मौका है?

भारत और बाकी अन्य देश इस बदलाव को अवसर के रूप में देख रहे हैं। भारत ने इसको ध्यान में रखकर कयी अहम कदम उठाए हैं:

  • रुपये में अंतरराष्ट्रीय व्यापार शुरू किया है।
  • डिजिटल रुपया (e₹) की शुरुआत की है।
  • BRICS बैंक और नई करेंसी पहल में सक्रिय भागीदारी कर रहा है।
  • मोदी सरकार ने 2025 के बजट में रुपये को ग्लोबल स्तर पर ले जाने के लिए नीति बनाई है।

भारत के लिए यह बेहद अच्छा मौका है खुद को और मज़बूत करने के लिए।

चुनौतियाँ भी हैं

हालाँकि डि‑डॉलराइजेशन तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन यह पूरी तरह से आसान नहीं है:

  • कई देशों के बीच मुद्राओं की स्थिरता नहीं है।
  • युआन और रूबल जैसे विकल्पों पर भरोसा अभी भी सीमित है।
  • डॉलर की लिक्विडिटी और ग्लोबल नेटवर्क अब भी मजबूत है।

इसलिए यह बदलाव रातों-रात नहीं होगा, बल्कि एक लंबी और रणनीतिक प्रक्रिया अपनानी और बनानी होगी जिसके तहत इसको अंजाम दिया जा सके।

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