ऋषिता गंगराडे़

नदी सूखने के प्रमुख कारण

  • भूस्खलन, कटाव और वनों की कटाईनदियों की घाटियों में वन कटने से भूमिगत जल की क्षमता प्रभावित होती है, जिससे नदी में आधार प्रवाह कम हो जाता है।
  • अधूरी जल संचयन और ग्राउंडवाटर रिचार्ज की कमीमानसून काल में जल संरक्षित न करने से जल पुनर्भरण रुक जाता है। इससे नदियों का सतत जल प्रवाह प्रभावित होता है।
  • उद्योगों और कृषि का अति दोहनऔद्योगिक और कृषि उद्देश्यों के लिए पानी का अत्यधिक दोहन और नदी-धारा का उपेक्षित उपयोग सूखने का प्रमुख कारण है।
  • अवैध रेत खनन एवं अतिक्रमणनदी तल से अवैध रूप से रेत निकलने से नदी मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं, जिससे प्राकृतिक प्रवाह बिगड़ता है।
  • प्रदूषण और अव्यवस्थित अपशिष्ट प्रवाह
  • untreated sewage, industrial effluent समेत अपशिष्टों के प्रवाह से नदी नष्ट होती जा रही है—खासकर Yamuna, Ganga किनारों परReddit+13ThePrint+13CNBC TV18+13
  • जलवायु परिवर्तन और असामान्य मौसमी पैटर्न
  • बदलते मौसम और असमय बारिश का प्रभाव भी जलस्तर और नदी प्रवाह को प्रभावित करता हैDrishti IASThe Tribune

ज़िम्मेदार कौन?

  • केंद्र एवं राज्य सरकारेंनदी मामलों में जल संसाधन योजनाओं के लिए नीति निर्धारण केंद्र द्वारा होता है, जबकि राज्य सरकारें स्थानीय जल उपयोग, संरक्षण एवं नदी संरक्षण की ज़िम्मेदार होती है।
  • संवैधानिक और कानूनी संस्थानInter‑State River Water Disputes Act (1956) जैसे कानूनों का अद्यतन होना ज़रूरी है, क्योंकि मौजूदा व्यवस्था राज्यों के बीच स्थायी समाधान में विफल होती रही है।
  • स्थानीय समुदाय और नागरिकनदी संरक्षण में जनता की भागीदारी और जागरूकता की कमी, नदी को सिर्फ शौचालय समझकर उपयोग करना हो रहा है—जिसे बदलने की ज़रूरत है।
  • पर्यावरणविद् एवं नागरिक समाज संगठनोंजैसे कि जल संरक्षण के कामों में प्रयत्नशील पर्यावरणविद राजेंद्र सिंह ने कहा है कि “विकास ने हमारी नदियों को सूखा दिया”—यह चेतावनी हमें जल-संरक्षण ओर ले जाती है।

मामले की ज़मीनी हक़ीक़त

  • राज्य‑स्तरीय पहलेंउत्तर प्रदेश सरकार ने ‘One District‑One River’ योजना के तहत कई छोटी नदियों को पुनर्जीवित किया है।
  • जैसे Pili नदी (Jaunpur), Noon नदी (Kanpur) आदि, जो वर्षों से सुखी थीं—इनमें मृदा उत्खनन, पौधरोपण और सामुदायिक भागीदारी से पुनः पानी बहना शुरू हुआ है।
  • रिवाजों पर आधारित सहभागिताUP के Gonda में Manorama नदी के लिए ‘श्रमदान’ कार्य शुरू हुआ, जिसमें पंचायतों, NGOs और स्थानीयों ने मिलकर नदी को पुनर्जीवित किया। परियोजना में जेसीबी से सफाई, पेड़ लगाना और पर्यावरणीय जागरूकता शामिल हैं|

समाधान और ज़िम्मेदारी वितरण

नीति सुधार और कानूनिक परिवर्तन

  • Inter‑State Water Disputes Act का संशोधन जो पारदर्शी, समयबद्ध और बाध्यकारी हो—इससे निर्णयों की जल्दी और निष्पक्षता आएगी।
  • नीति में दृढ़ता से wastewater treatment वृद्धि, rainwater harvesting, और जल लेखन (water accounting) जैसी व्यवस्था अपनाना ज़रूरी है|

स्थानीय स्तर पर सामुदायिक भागीदारी

  • बंगाल, UP, MP जैसे राज्यों में NGOs और ग्राम पंचायतों द्वारा संचालित परियोजनाएं दिखाती हैं कि भागीदारी से नदी पुनरुद्धार संभव है|

तकनीकी हस्तक्षेप और सतत प्रवर्तन

  • भूमि कटाव नियंत्रण हेतु बौलडर चेक, recharge injection wells और water pools जैसे जल संरक्षण प्रयास प्रभावी साबित हुए हैं|
  • अनियमित रेत खनन, अतिक्रमण व औद्योगिक प्रदूषण पर कठोर कार्रवाई की जरूरत है—for polluters to be penalized, even jailed)—as environmentalist Rajendra Singh highlighted।
  • afforestation along riverbanks and watershed development नदी तट पर पेड़ लगाना, soil conservation और watershed projects से दीर्घकालिक जल स्थिरता सुनिश्चित होती है|

 नदी हमारी ‘अपनी’ कैसे बने?

  • सूखती धाराओं के लिए सिर्फ सरकारें जिम्मेदार नहीं—केंद्र और राज्यों के बीच नीति स्पष्टता, समुदाय की भागीदारी एवं सक्रिय पर्यावरणीय संरक्षा ज़रूरी है।
  • यदि नदियों को जीवनदायिनी माना जाए और उन्हें संरक्षित करने में सभी—सरकारी संस्थाएँ, पर्यावरणविद्पर, समाज और आम जनता, मिलकर काम करें—तो ‘नदी हमारी अपनी’ बन सकती है।
  • स्थानीय पहलों को समर्थन देकर, कानून को मजबूत कर, जल प्रवाह की मूल संरचना को बचा कर और सामुदायिक जागरूकता बढ़ाकर हम सूखती धाराओं को पुनर्जीवित कर सकते हैं।

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