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रिपोर्ट रोहित रजक भोपाल। राजधानी भोपाल के स्कूलों में पढ़ रही बालिकाओं के लिए शर्म और परेशानी का सबब बन चुके 374 शौचालय आज भी मरम्मत का इंतजार कर रहे हैं। वजह साफ है – राज्य शिक्षा केंद्र ने इन शौचालयों की मरम्मत के लिए अब तक कोई भी राशि जारी नहीं की।

राजधानी की मिडिल और प्राइमरी स्कूलों में छात्राओं की संख्या लगातार बढ़ रही है लेकिन उनके लिए जरूरी मूलभूत सुविधाएं, जैसे कि साफ और सुरक्षित शौचालय, उपेक्षा का शिकार बनी हुई हैं।


प्रमुख बिंदु:

राजधानी के कुल 174 बालिका विद्यालयों में सबसे ज्यादा जर्जर शौचालय पाए गए हैं।

कुल 374 स्कूलों के शौचालय मरम्मत योग्य पाए गए लेकिन अब तक काम शुरू नहीं हो पाया।

बीआरसीसी ने तीन बार प्रस्ताव बनाकर राज्य शिक्षा केंद्र को भेजे, लेकिन कोई फंड जारी नहीं हुआ।

छात्राओं को खुले में या गंदे शौचालयों का इस्तेमाल करने पर मजबूर होना पड़ रहा है।

कई स्कूलों में शौचालय इतने खराब हैं कि उनमें जाना खतरे से खाली नहीं।


शौचालय या बीमारी का अड्डा ?

भोपाल जिले के कई सरकारी स्कूलों में शौचालय इस हालत में हैं कि उनसे बदबू आती है, दीवारें टूटी हुई हैं और कई जगहों पर पानी की सप्लाई तक नहीं है। ऐसे हालात में छात्राएं बीमारियों की चपेट में आ रही हैं, लेकिन प्रशासन के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही।

बीआरसीसी अधिकारी लगातार मांग कर रहे हैं कि जल्द से जल्द मरम्मत कार्य कराया जाए ताकि छात्राओं को राहत मिले। तीन बार प्रस्ताव भेजे गए, लेकिन जवाब नदारद है। इससे साफ है कि बालिकाओं की सुरक्षा और स्वास्थ्य राज्य शिक्षा केंद्र की प्राथमिकता में नहीं है।


‘इन्फ्रास्ट्रक्चर सुधार’ सिर्फ कागजों में

स्कूलों के विकास और ‘बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ’ जैसी योजनाओं की हकीकत तब सामने आती है जब स्कूल की बच्चियां शौच के लिए परेशान होती हैं। कितनी विडंबना है कि जिन स्कूलों को ‘आदर्श विद्यालय’ कहा जा रहा है, वहां शौचालय की हालत देख कर शर्म आ जाए।

बीते सालों में केंद्र और राज्य सरकारों ने करोड़ों रुपये इनफ्रास्ट्रक्चर सुधार के नाम पर खर्च करने का दावा किया है, लेकिन जमीनी हालात इससे बिल्कुल अलग हैं।


शिक्षकों और अफसरों की चिंता

बीआरसीसी स्तर के अधिकारी यह कह रहे हैं कि उन्होंने पूरी प्रक्रिया के अनुसार प्रस्ताव भेजा, लेकिन उच्च स्तर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। ऐसे में अब स्थानीय जनप्रतिनिधियों और समाजसेवियों से मदद की उम्मीद की जा रही है। वहीं, कई प्रधानाध्यापक चाहते हैं कि जर्जर भवनों और शौचालयों में बच्चों को बैठाने से छूट मिले ताकि भविष्य में कोई दुर्घटना न हो।


क्या कहते हैं ज़िम्मेदार ?

आर्के यादव, डीईओ, भोपाल –
“हमने कई बार प्रस्ताव भेजे, लेकिन राशि अब तक नहीं मिली। हम फिर से राज्य शिक्षा केंद्र को पत्र भेज रहे हैं ताकि जल्दी समाधान हो सके।”


कागज़ों में आदर्श, ज़मीन पर बदहाल

राजधानी के बालिका विद्यालयों में सुविधाओं की हालत किसी से छुपी नहीं। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के नारे सिर्फ दीवारों पर चमक रहे हैं, हकीकत में बच्चियां बदबूदार, टूटे-फूटे शौचालयों में जाने को मजबूर हैं। यही वो असली तस्वीर है, जो हमें बताती है कि सरकारों की योजनाएं और जमीनी काम में कितना फर्क है।

शिक्षा सिर्फ किताबों से नहीं मिलती, एक अच्छा माहौल, साफ-सुथरा परिसर और सुरक्षित सुविधा भी जरूरी है। लेकिन अफसोस, ये सब तब तक मिलेगा नहीं जब तक फाइलों के ढेर से निकलकर कोई अफसर जिम्मेदारी नहीं उठाएगा।



शहर की बेटियां बेहतर भविष्य की आस लिए स्कूल जा रही हैं, लेकिन शौचालय की बुनियादी समस्या आज भी उनके आत्मसम्मान और स्वास्थ्य पर भारी पड़ रही है। क्या अब भी सरकार जागेगी या फिर अगली योजना आने तक इंतजार करना होगा?

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