रानू यादव: उत्तर प्रदेश की पूजा जिसकी उम्र 17 साल है वह एक छोटे से गांव में एक छोटी सी झोपडी के रहने वाली है, जो इस समय अपने वैज्ञानिक खोज से काफी चर्चे में है। अभी हाल ही में अपने इस उपलब्धि के लिए जापान भी गई थी। उनका यह मॉडल अब राष्ट्रीय पहचान बन गया है इस शोध को केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय अब पूजा के घर के सामने से गुज़रने वाले हर एक व्यक्ति उनके इस उपलब्धि के वजह से उनके घर की तरह एक बार मुड़ कर ज़रूर देखता है।
कैसे बनाया मॉडल?
जब पूजा 8th क्लास में थी तब उन्हें डस्ट- फ्री थ्रेसर बनाने का उनके मन ने आइडिया आया उसके बाद पूजा ने उस मॉडल में समय के साथ कई सुधार करके एक धूल रहित थ्रेसर मॉडल बनाया है, जो एक स्कूल में धूल की समस्या को हल करने के लिए प्रेरित था। उसने टिन और पंखे का उपयोग करके एक ऐसा मॉडल बनाया जो धूल को एक थैले में जमा कर लेता है, जिससे पर्यावरण और किसानों दोनों के लिए यह उपयोगी है।
इस मॉडल को 2023 में ‘इंस्पायर’अवार्ड की राष्ट्रीय प्रतियोगिता में चुना गया,जिसमें पूरे देश से 60 विजेताओं में उत्तर प्रदेश से सिर्फ पूजा का नाम चुना गया है।
कैसा है इस मॉडल में सफलता हासिल करने वाली पूजा का फैमिली बैकग्राउंड?
पूजा के पिता एक दियाड़ी मजदूर है वही उनकी मां प्राथमिक विद्यालय में रसोईयों का काम करती है। पूजा 5 भाई बहन है जिसमें 3 बहन और दो भाई है। ये सभी लोग छोटे से गांव ढलईपुरवा में झोपडी से बने घर में रहते है जिसने बारिश के समय पानी भर जाता है। दीपक की रोशनी में पढ़ाई करना पड़ता है।पूजा इस समय 12th में है और जगदीशचंद्र फतेहराय इंटर कॉलेज की छात्रा है।
कहां से आया यह मॉडल बनाने का आइडिया?
पूजा को यह मॉडल बनाने का सुझाव तब आया जब वह 8th क्लास में थी। और अपने स्कूल के पास चल रहे थ्रेसर से धूल उड़ के क्लास में आ रहा था जिससे उनकी पढ़ाई करने और सांस लेने में काफी तकलीफ हो रही थी।बीबीसी के रिपोर्ट के अनुसार, पूजा का कहना है कि मैने यह बात अपने राजीव सर को बताई और उनसे पूछा कि सर हम इस धूल को कैसे रोक सकते है? और जब कुछ दिन बाद जब घर में मां को आटा छानते देखा ,तो आटा छननी से मुझे इस धूल को रोकने का विचार आया।”इसके बाद राजीव सर की मदद से सबसे पहले इसे चार्ट पेपर बनाया फिर कागज़ और लकड़ी से मॉडल तैयार किया, लेकिन वह उतना सही नहीं था। और बाद में वेल्डिंग मशीन से टीन की मदद से अंतिम मॉडल जिसका नाम ‘भूसाधूल पृथक्करण यंत्र’ बना।
कैसे काम करता है यह मॉडल ?
यह अनाज निकालते समय उड़ने वाली धूल और फेफड़ों को प्रभावित करने वाले सूक्ष्म कण को रोकने में मदद करता है। यह किसानों के साथ खुले में काम करने वाले मजदूर और महिलाओं के सेहत के दृष्टी से भी बहुत उपयोगी है।
पूजा के इस उपलब्धि का श्रेय उनके टीचर राजीव श्रीवास्तव को भी जाता है ।जिन्होंने इस मॉडल में शुरू से लेकर अंतिम रूप तक उनका मार्गदर्शन किया।
किस योजना के तहत मिला पूजा को यह सुनहरा मौका?
पूजा को इंटरनेशनल लेवल तक पहुंचाने वाली योजना का नाम है, “इंस्पायर अवॉर्ड मानक” यह योजना भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग की एक पहल है।
इस योजना का उद्देश्य स्कूली बच्चों के वैज्ञानिक सोच को बढ़वा देना है।
“वर्ष 2006 में शुरू की गई इस योजना में, 2023 तक पूरे देश से 7 लाख से अधिक छात्रों ने आवेदन किया था। इनमें से लगभग 1 लाख प्रतिभागियों को उनके मॉडल के लिए 10 हज़ार रुपये की प्रोत्साहन राशि दी गई।”
