
कामना कासोटिया: भोपाल। उच्च शिक्षा विभाग द्वारा शुरू किया गया ‘सार्थक ऐप’ पारदर्शिता और उपस्थिति को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लाया गया था, लेकिन हाल ही में इस ऐप से जुड़े बड़े फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ है।
इस खुलासे में कई अतिथि विद्वानों ने घर बैठे मोबाइल से बनियान पहनकर अपनी अटेंडेंस लगा दी। इतना ही नहीं, कुछ ने तो बिस्तर पर लेटे-लेटे या बाहर घूमते हुए भी उपस्थिति दर्ज कराई।घर से लगाई अटेंडेंस, वीडियो में हुआ खुलासाइस फर्जीवाड़े की पोल तब खुली जब ‘सार्थक ऐप’ पर अपलोड की गई तस्वीरों की जांच की गई। तस्वीरों में कुछ अतिथि विद्वान बनियान में, कुछ तकिए पर लेटे और कुछ बिल्कुल ही लापरवाही से उपस्थिति दर्ज कराते दिखे।
जांच के दौरान सामने आया कि प्रदेश के 25 सरकारी कॉलेजों के लगभग 100 अतिथि विद्वान ऐसे हैं, जिन्होंने कॉलेज गए बिना ही ऐप पर अपनी उपस्थिति दर्ज की।
इनमें से ग्वालियर, श्योपुर और गंजबासौदा के कॉलेज प्रमुख रूप से सामने आए हैं।अतिथि विद्वानों पर गिरी गाज, प्रिंसिपल-प्रोफेसर बच निकलेहैरानी की बात यह है कि इस पूरे मामले में सिर्फ अतिथि विद्वानों पर कार्रवाई की गई है, जबकि संबंधित कॉलेजों के प्रिंसिपल और स्थायी फैकल्टी को कोई सजा नहीं दी गई।
गंजबासौदा के सरकारी कॉलेज में कार्यरत डॉ. सोहन कुमार यादव (प्रिंसिपल), प्रकाश चंद्र मौर्य (अतिथि विद्वान), हेमंत कुमार सक्सेना (अतिथि विद्वान), श्योपुर की प्राचार्या सुनीता यादव और अतिथि विद्वान शैलेश श्रीवास्तव की तस्वीरें सामने आई हैं, जिनमें वे बेहद लापरवाह ढंग से अटेंडेंस दर्ज करते नजर आ रहे हैं।
क्यों नहीं हुई स्थायी फैकल्टी पर कार्रवाई?
यह सवाल अब उठ रहा है कि जब अतिथि विद्वानों पर इतनी सख्त कार्रवाई हो रही है, तो स्थायी प्रोफेसर और प्राचार्यों को क्यों छोड़ा गया?कई कॉलेजों में प्राचार्य खुद ऐप से जुड़ी निगरानी के जिम्मेदार होते हैं।
अगर कॉलेज में शिक्षक उपस्थित नहीं थे, तो यह लापरवाही सिर्फ अतिथि विद्वानों की नहीं, बल्कि प्रशासन की भी मानी जाएगी।फिर भी कार्रवाई में सिर्फ अस्थायी शिक्षकों को ही सजा दी जा रही है, जिससे भेदभाव का आरोप लग रहा है।बेहतर होनी चाहिए निगरानीसार्थक ऐप की सोच अच्छी थी, लेकिन उसकी निगरानी कमजोर साबित हुई। यदि समय रहते कॉलेज प्राचार्य और विभाग सख्ती बरतते, तो यह फर्जीवाड़ा सामने ही नहीं आता।
अब जरूरत है कि सिर्फ कार्रवाई न करके निगरानी तंत्र को और मजबूत किया जाए, जिससे भविष्य में इस तरह की घटनाएं रोकी जा सकें।यह मामला यह दिखाता है कि तकनीक लाकर सिर्फ समाधान नहीं होता, जब तक उसके क्रियान्वयन और निगरानी में पारदर्शिता और ईमानदारी न हो।अतिथि विद्वानों की गलती अपनी जगह, लेकिन पूरी व्यवस्था पर सवाल उठते हैं जब जिम्मेदार अधिकारी कार्रवाई से बचे रह जाते हैं।
