ऋषिता गंगराडे़

“डिजिटल इंडिया” का सपना जब शिक्षा व्यवस्था से जुड़ता है, तो उम्मीद की जाती है कि भारत का हर बच्चा स्मार्टफोन, टैबलेट या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए आधुनिक शिक्षा तक पहुंच पाएगा। लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे काफी अलग है। विशेषकर ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में डिजिटल शिक्षा अब भी एक सपना ही है — आधा अधूरा और असमान।

सरकारी योजनाओं की हकीकत

सरकार ने ‘दीक्षा पोर्टल’, ‘स्वयं’ और ‘ई-पाठशाला’ जैसे कई डिजिटल प्लेटफॉर्म शुरू किए हैं। साथ ही राज्यों को स्मार्ट क्लास, टैबलेट और डिजिटल कंटेंट के लिए बजट भी आवंटित किया गया। परंतु असल में—

  • कई स्कूलों में बिजली की नियमित आपूर्ति नहीं है।इंटरनेट कनेक्टिविटी न के बराबर है।
  • शिक्षक इन तकनीकों के उपयोग के लिए प्रशिक्षित नहीं हैं।
  • कई छात्रों के पास अपने Safety या टैबलेट नहीं हैं, खासकर पिछड़े क्षेत्रों में।

एक रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीण भारत में केवल 24% छात्रों के पास ऑनलाइन पढ़ाई की सुविधाएं उपलब्ध हैं।

कोविड-19 के बाद की सीख

कोरोना महामारी के दौरान स्कूल बंद हो गए, और छात्रों की पढ़ाई पूरी तरह ऑनलाइन हो गई। इस समय ने यह उजागर कर दिया कि देश में डिजिटल डिवाइड (डिजिटल असमानता) कितनी गहरी है। शहरी छात्र जहां ज़ूम और गूगल क्लासरूम पर क्लास कर रहे थे, वहीं लाखों बच्चे पढ़ाई से पूरी तरह कट गए।

स्क्रीन पर शिक्षा: क्या यह ही भविष्य है?

अब सवाल ये है कि क्या पढ़ाई के लिए ‘स्क्रीन’ अनिवार्य हो चुकी है? उत्तर ‘हाँ’ है — लेकिन केवल स्क्रीन देना काफी नहीं। जरूरी है—

  • डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास
  • शिक्षकों का प्रशिक्षण
  • भाषा और सांस्कृतिक अनुकूल डिजिटल कंटेंट
  • और सबसे जरूरी — सभी बच्चों तक समान पहुंच

डिजिटल शिक्षा का लक्ष्य noble है, लेकिन उसे हासिल करने के लिए केवल टैबलेट बांटना या ऐप लॉन्च करना पर्याप्त नहीं। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि देश का हर बच्चा, चाहे वह किसी भी गांव या जिले से हो, डिजिटल क्रांति का लाभ उठा सके।क्योंकि शिक्षा का अधिकार तभी साकार होगा, जब स्क्रीन से पहले संकल्प और नीति से पहले नीयत मजबूत होगी।ASER 2024

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