नई दिल्ली | रिपोर्ट: रोहित रजक

कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की एनसीईआरटी (राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद) की किताब में मुग़ल काल को लेकर किए गए बदलावों पर एक नई बहस शुरू हो गई है। अब मुगल शासकों की भूमिका को नए तरीके से प्रस्तुत किया गया है, जिससे इतिहास की पारंपरिक समझ को चुनौती मिल रही है।

एनसीईआरटी ने हाल ही में जारी अपने सामाजिक विज्ञान की किताब “Exploring Society: India and Beyond” में मुगलों के इतिहास को नए दृष्टिकोण से लिखा है।

किताब के अनुसार, अकबर को जहां एक ओर सहिष्णु शासक बताया गया है, वहीं दूसरी ओर उसे क्रूर भी बताया गया है। औरंगजेब को एक कट्टर धार्मिक शासक कहा गया है जबकि बाबर को सैन्य रणनीति में कुशल बताया गया है।

क्या बदला गया है किताब में?

एनसीईआरटी की नई किताब में लिखा गया है कि अकबर का शासन (1556 से 1605) एक तरफ तो सहिष्णुता का प्रतीक था, जिसमें उन्होंने सभी धर्मों को समान दृष्टि से देखा और दीन-ए-इलाही जैसी नई धार्मिक विचारधारा का प्रस्ताव रखा। लेकिन साथ ही यह भी बताया गया है कि उन्होंने सत्ता की रक्षा के लिए कठोर कदम भी उठाए। उन्होंने कई युद्ध लड़े और लाखों सैनिकों को मारा।

किताब में यह भी बताया गया है कि अकबर ने 30,000 राजपूत सैनिकों की हत्या का आदेश दिया था। साथ ही उनकी प्रशासनिक नीति को प्रशंसा मिली है, लेकिन उनकी सैनिक क्रूरता को भी उजागर किया गया है।

औरंगजेब को बताया गया कट्टर धार्मिक शासक

नई व्याख्या में औरंगजेब को धर्म के मामले में बहुत कट्टर बताया गया है। किताब में कहा गया है कि उन्होंने हिंदू मंदिरों को तुड़वाया और इस्लामी कानूनों को सख्ती से लागू किया। उनके शासन काल को धार्मिक असहिष्णुता और कड़ी प्रशासनिक व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

बाबर को सैन्य रणनीतिकार बताया गया

बाबर को एक दूरदर्शी और प्रभावशाली सेनापति बताया गया है। किताब में उल्लेख है कि बाबर ने पानीपत की पहली लड़ाई (1526) में इब्राहिम लोदी को हराकर दिल्ली की सल्तनत पर कब्जा किया। उन्होंने तोपों का प्रभावी उपयोग कर भारतीय युद्ध नीति में बदलाव लाया।

जहांगीर और शाहजहां को कला संरक्षक के रूप में चित्रित किया गया

नई किताब में जहांगीर और शाहजहां के योगदान को मुख्य रूप से कला, चित्रकला और वास्तुकला के क्षेत्र में दिखाया गया है। शाहजहां के शासन में बनी ताजमहल जैसी इमारतों को भारतीय स्थापत्य कला का अद्भुत उदाहरण बताया गया है। जहांगीर को प्रकृति प्रेमी और चित्रकला का संरक्षक बताया गया है।

क्यों हो रही है इस पर बहस?

कई इतिहासकारों और शिक्षकों ने एनसीईआरटी की इस नई व्याख्या पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि छात्रों के सामने इतिहास को निष्पक्ष और सटीक रूप में प्रस्तुत करना चाहिए, न कि किसी खास दृष्टिकोण से। आलोचकों का कहना है कि यह बदलाव एक विशेष विचारधारा को बढ़ावा देने की कोशिश हो सकती है।

हालांकि, एनसीईआरटी का कहना है कि यह बदलाव पाठ्यक्रम को यथार्थपरक और संतुलित बनाने के लिए किए गए हैं। उनका तर्क है कि छात्रों को इतिहास के सभी पक्षों से अवगत कराना ज़रूरी है ताकि वे खुद अपने विचार बना सकें। एनसीईआरटी की किताबों में मुगल काल की यह नई व्याख्या निश्चित ही आने वाले समय में इतिहास पढ़ाने और समझने के तरीके को प्रभावित करेगी।

यह बदलाव सिर्फ अकबर, औरंगजेब या बाबर की छवि तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह देश में इतिहास के प्रति दृष्टिकोण और शैक्षणिक दृष्टि को भी दर्शाते हैं। अब देखना होगा कि यह बदलाव छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों के बीच कैसे स्वीकार किए जाते हैं।

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