पैथोलॉजी संचालक दे रहे मोटा कमीशन, मरीजों से वसूले जा रहे भारी पैसे

Report Rohit Rajak ग्वालियर । मौसम बदलते ही ग्वालियर जिले में मौसमी बीमारियों का प्रकोप बढ़ गया है। बुखार, उल्टी-दस्त, डेंगू, मलेरिया, टायफाइड जैसी बीमारियों के मामले तेजी से सामने आ रहे हैं।
इन बीमारियों के इलाज के नाम पर निजी डॉक्टर और पैथोलॉजी संचालक मिलकर मरीजों की जेब पर भारी चोट कर रहे हैं। जांच के नाम पर अनावश्यक टेस्ट कराए जा रहे हैं, जिनका असली मकसद मरीज की बीमारी जानना नहीं, बल्कि मोटा कमीशन कमाना है।
जिले में फिलहाल करीब 165 पैथोलॉजी लैब संचालित हो रही हैं, जिनमें से 80 से अधिक लैब क्लेक्शन सेंटर के माध्यम से चल रही हैं। नियमों के अनुसार एक लैब पर ही सैंपलिंग होनी चाहिए, लेकिन यहां अलग-अलग सेंटरों से जांच के नाम पर सैंपल इकट्ठा किया जा रहा है।
पैथोलॉजी संचालकों और डॉक्टरों के बीच सीधा सौदा होता है। डॉक्टर मरीज को जांच के लिए उस लैब में भेजता है, जिससे उसे अधिक कमीशन मिलता है। एक सामान्य सोनोग्राफी की फीस 700 रुपए होती है।
जिसमें से डॉक्टर को 30% यानि 210 रुपए मिलते हैं। शहर में हर महीने औसतन 22,000 सोनोग्राफी होती हैं, जिससे डॉक्टरों को महीने भर में 46 लाख से ज्यादा का कमीशन मिलता है।
कैसे काम करता है यह खेल ?
मरीज डॉक्टर के पास जाता है, डॉक्टर उसे किसी खास पैथोलॉजी में जांच के लिए भेजता है। वहां जांच की फीस वसूली जाती है, और उसका कुछ हिस्सा डॉक्टर को कमीशन के रूप में मिल जाता है। कुछ सेंटरों पर तो एक जांच पर 30 से 50 प्रतिशत तक कमीशन दिया जा रहा है। यह कमीशन 300 से 400 रुपए प्रति मरीज तक पहुंचता है।
शहर में ऐसे कई पैथोलॉजी संचालक हैं जो सिर्फ डॉक्टरों को ज्यादा कमीशन देने के लिए काम कर रहे हैं। मेडिकल काउंसिल और इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के नियमों के मुताबिक, किसी भी जांच पर कमीशन देना अपराध है। लेकिन प्राइवेट डॉक्टरों और संचालकों ने इसे व्यापार बना लिया है।
कमीशन ने लिया विकराल रूप
एक सीनियर डॉक्टर ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि पहले केवल कुछ डॉक्टर ही कमीशन लेते थे, लेकिन अब यह रिवाज बन गया है। करीब 80% डॉक्टर कमीशन ले रहे हैं। कुछ डॉक्टर 60 से 70 प्रतिशत तक कमीशन न मिलने पर पैथोलॉजी का नाम ही काट देते हैं।
शहर में कई ऐसी पैथोलॉजी हैं जो सिर्फ कमीशन के दम पर चल रही हैं। मरीज चाहे जांच करवाए या नहीं, रिपोर्ट तो तैयार हो ही जाती है। खासकर गरीब और ग्रामीण मरीजों से ज्यादा पैसे वसूले जा रहे हैं, क्योंकि उन्हें यह पता ही नहीं होता कि जांच की असली कीमत क्या है।
नतीजा – नुकसान मरीज का
इस पूरे खेल में सबसे ज्यादा नुकसान मरीजों का हो रहा है।
उन्हें गैरजरूरी जांचें करवाई जाती हैं
बीमारी के नाम पर डराया जाता है
इलाज का खर्च बढ़ा दिया जाता है
सरकारी सिस्टम इस गोरखधंधे पर आंख मूंदे बैठा है। न तो हेल्थ डिपार्टमेंट जांच करता है, न ही कोई निगरानी तंत्र सक्रिय है। डॉक्टर और पैथोलॉजी संचालक मिलकर मरीज की मजबूरी का फायदा उठा रहे हैं।
जरूरत है सख्त कार्रवाई की
सरकार को चाहिए कि निजी डॉक्टरों और पैथोलॉजी पर निगरानी बढ़ाए अनावश्यक जांच कराने पर कार्रवाई हो कमीशन सिस्टम पर रोक लगे मरीजों को जांच की असली कीमत और अधिकारों की जानकारी दी जाए,अगर यह खेल यूं ही चलता रहा, तो मरीजों की जेब और सेहत दोनों पर भारी पड़ता रहेगा।

