दीपाली यदुवंशी: भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर इन दिनों तीन दिवसीय चीन यात्रा* पर हैं। यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब वैश्विक राजनीति में कई बदलाव हो रहे हैं। चीन‑अमेरिका व्यापारिक तनाव, भारत‑पाक संबंधों में जल नीति को लेकर नया मोड़, और दक्षिण एशिया में पुनर्संतुलन की प्रक्रिया। जयशंकर का यह दौरा केवल कूटनीतिक भेंट नहीं, बल्कि रणनीतिक दिशा का प्रतीक भी माना जा रहा है।
यात्रा के मुख्य उद्देश्य:
1. सीमा विवादों पर संवाद
लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश को लेकर भारत‑चीन के बीच लंबे समय से तनाव बना हुआ है। 2020 की गलवान घाटी की घटना के बाद पहली बार ऐसा व्यापक वार्तालाप हो रहा है जिसमें दोनों पक्ष “सीमा पर स्थायित्व” की दिशा में सहमत हो सकते हैं।
2. व्यापारिक संतुलन को पुनर्स्थापित करना
चीन और भारत के बीच व्यापार घाटा भारत के पक्ष में नहीं रहा। जयशंकर का प्रयास है कि चीन भारतीय उत्पादों पर गैर-जरूरी प्रतिबंध हटाए और IT, फार्मा और टेक्नोलॉजी क्षेत्र में भारतीय कंपनियों को बराबरी का मौका दे।
3. वैश्विक मंचों पर सहयोग की संभावनाएँ
BRICS, SCO, और G20 जैसे मंचों पर भारत और चीन दोनों की भूमिका बड़ी है। भारत चाहता है कि इन मंचों पर द्विपक्षीय तनाव वैश्विक सहमति को बाधित न करें।
प्रमुख बिंदु चर्चा में:
1)LAC विवाद- यथास्थिति की बहाली, सैन्य वापसी – बातचीत को जारी रखने की सहमति
2)व्यापार – भारतीय कंपनियों को चीनी बाजार में प्रवेश ,’आंतरिक सुरक्षा कारणों’ का हवाला
3)डिजिटल नीति – TikTok और चीनी ऐप्स पर भारत की सख्ती , डेटा सुरक्षा को लेकर चर्चा
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
विदेश नीति विश्लेषक रेखा शर्मा का मानना है कि भारत अब केवल प्रतिक्रियात्मक नहीं, बल्कि निर्णायक विदेश नीति अपना रहा है। जयशंकर का चीन दौरा इस बदलाव का उदाहरण है। जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अभिनव वत्स कहते हैं: “चीन के साथ संवाद बनाए रखना जरूरी है, लेकिन समर्पण की भावना नहीं—यह भारत की नई रणनीतिक पहचान को दर्शाता है।”
संभावित परिणाम और भविष्य की दिशा
1. सीमा पर स्थायित्व की दिशा में प्रगति
यदि दोनों पक्ष LAC पर यथास्थिति बहाल करने के लिए सहमत होते हैं, तो यह 2020 के बाद का सबसे सकारात्मक संकेत होगा।
2. व्यापार में नया अध्याय
भारतीय स्टार्टअप्स और टेक कंपनियों को चीन के बाजार तक पहुंच मिल सकती है, जिससे व्यापार घाटा घटेगा।
3. क्षेत्रीय नेतृत्व की होड़ में सामंजस्य
एशिया में चीन को संतुलित करने के लिए भारत को जापान, ऑस्ट्रेलिया और ASEAN देशों से गहरे रिश्ते बनाने होंगे।
डॉ. जयशंकर का चीन दौरा केवल बैठक या राजनयिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि भारत की नई कूटनीतिक भाषा का परिचायक है। जहां एक ओर वह सख्ती से अपने हितों की रक्षा कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर वैश्विक स्थायित्व के लिए संवाद भी कायम रखे हुए हैं।
एस. जयशंकर (फोटो:X) 