रोहित रजक, सीधी: सीधी जिले की गर्भवती महिला लीला साहू ने एक साल पहले एक वीडियो बनाकर अपने गांव तक सड़क बनवाने की मांग की थी। उन्होंने वीडियो के जरिए सरकार और प्रशासन से अपील की थी कि गांव की हालत बहुत खराब है और गर्भवती महिलाओं, बीमार लोगों व बच्चों को अस्पताल तक ले जाना बेहद कठिन है।
वीडियो वायरल हुआ था और तब अधिकारियों ने आश्वासन दिया था कि सड़क जल्दी बनवा दी जाएगी। लेकिन एक साल बीतने के बाद भी न तो सड़क बनी और न ही किसी अधिकारी ने मौके पर जाकर हालात देखे। इससे नाराज होकर लीला साहू ने एक बार फिर वीडियो बनाकर नेताओं और प्रशासन को चेताया और सवाल किया कि आखिर गरीबों की सुनवाई कब होगी?
इस वीडियो को लेकर जब सांसद डॉ. राजेश मिश्रा से सवाल किया गया, तो उन्होंने एक बेहद चौंकाने वाला बयान दे दिया। उन्होंने कहा, “प्रेग्नेंसी की डेट बताओ, हम एक हफ्ता पहले उठा लेंगे।” सांसद के इस बयान की सोशल मीडिया पर तीखी आलोचना हो रही है। लोगों ने इसे अमानवीय और गैरजिम्मेदाराना बताया है।
लीला साहू की स्थिति और संघर्ष
लीला साहू अपने गांव की इकलौती महिला नहीं हैं जो सड़क की मांग कर रही हैं। गांव में दर्जनों महिलाएं हैं जो हर महीने गर्भावस्था, प्रसव, और अन्य बीमारियों के दौरान कच्ची पगडंडियों पर जान जोखिम में डालकर अस्पताल पहुंचती हैं। बरसात के दिनों में स्थिति और भी खराब हो जाती है।
गांववालों का कहना है कि कई बार वे जनप्रतिनिधियों से मिल चुके हैं लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन ही मिला। जमीन अधिग्रहण, बजट की कमी या प्रशासनिक देरी जैसे कारणों को बताकर मामला टाल दिया जाता है।
सांसद ने ठीकरा पिछली सरकार पर फोड़ा
सांसद राजेश मिश्रा ने लीला साहू के वीडियो पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “हमारे पास जनप्रतिनिधि हैं, एटी कार्ड हैं, फिर भी सड़क नहीं बनी है, इसका मतलब है कि पिछली सरकार कुछ नहीं कर पाई। हम प्रयास कर रहे हैं लेकिन सड़क इंजीनियर बनाते हैं, सांसद नहीं। जिम्मेदारी पिछली सरकार की है।”
सांसद का यह बयान लोगों को और नाराज कर गया। ग्रामीणों का कहना है कि हर बार नेताओं के मुंह से बस यही सुनने को मिलता है – “हम क्या करें, हमारी जिम्मेदारी नहीं है।”
सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रिया
इस पूरे मामले पर सोशल मीडिया पर भारी विरोध देखा गया। लोगों ने सवाल उठाया कि एक गर्भवती महिला की अपील पर अगर ऐसा मजाकिया और गैरजिम्मेदाराना जवाब मिलेगा तो आम जनता कैसे भरोसा करे? एक यूजर ने लिखा – “अगर जनता के चुने हुए प्रतिनिधि ही इस तरह की बात करेंगे तो न्याय की उम्मीद किससे की जाए?”यह ना केवल एक महिला की सड़क मांगने की नहीं है, बल्कि एक पूरे तंत्र की संवेदनहीनता और लापरवाही को उजागर करती है।
जहां एक ओर सरकार “सबका साथ, सबका विकास” की बात करती है, वहीं ज़मीनी हकीकत इसके उलट दिख रही है। लीला साहू जैसी महिलाओं की आवाज़ अगर इसी तरह अनसुनी की जाती रही, तो विकास की राह में सबसे बड़ा रोड़ा खुद वो तंत्र बन जाएगा जो जनता की सेवा करने का दावा करता है। जनता को जवाब चाहिए, और वो भी संवेदनशीलता के साथ, न कि मजाक में टालने वाले बयानों के जरिए।

