काजल जाटव। कारगिल युद्ध (1999) भारत और पाकिस्तान के बीच का सबसे बड़ा और संवेदनशील संघर्ष रहा है। इस लड़ाई में भारत ने अपनी बहादुरी और हिम्मत का सबूत दिया, शहीदों को गर्व से याद किया, मगर पाकिस्तान ने अपने सैनिकों के शव लेने से मना कर दिया। इनमें से एक थे कैप्टन करनल शेर खान जिन्हे अब पाकिस्तान ने आखिरकार सम्मान देना शुरू किया है। ये वही शख्स थे, जिनके शव को भारत ने सम्मान के साथ दफनाया था, लेकिन उस समय पाकिस्तान ने इसे अपने सैनिक मानने से ही इनकार कर दिया था।

क्या है पूरी कहानी?

कैप्टन करनल शेर खान पाकिस्तान की नॉर्दर्न लाइट इन्फैंट्री का अधिकारी थे और कारगिल की जंग में टाइगर हिल के पास एक बंकर पर कब्जा करने के दौरान शहीद हुए। जब भारतीय सेना ने उनका शव खोजा, तो पाया कि उन्होंने साहस और बहादुरी के साथ लड़ते हुए अपनी जान दी। भारतीय अधिकारियों ने पाकिस्तान को इस हीरो की बहादुरी की जानकारी दी और उनके शव को सम्मान के साथ वापस भेजा, मगर पाकिस्तान ने उस पर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

‘निशान-ए-हैदर’

अब, 25 साल बाद, पाकिस्तान ने आखिरकार उस हीरो को याद किया है। पाकिस्तान सरकार ने करनल शेर खान को ‘निशान-ए-हैदर’ मिला, जो पाकिस्तान का सबसे बड़ा वीरता पुरस्कार है। हाल ही में पाकिस्तानी सेना ने उनके बलिदान को याद करते हुए एक वीडियो भी रिलीज किया है और श्रद्धांजलि दी है। यह सारा कुछ उस वक्त हुआ है जब कारगिल युद्ध की 25वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है।

यह कहानी न केवल कारगिल युद्ध की जटिलताओं को समझाने में मदद करती है, बल्कि दिखाती है कि युद्ध के दौरान भी, दुश्मन की बहादुरी का सम्मान भारत करता आया है। भारत की परंपरा है कि वह शत्रु सैनिकों के शवों का सम्मान करता है और उन्हें मर्यादा से संभालता है। आज, जब पाकिस्तान अपने ‘कारगिल हीरो’ को सम्मान दे रहा है, तो यह उस चैन को याद दिलाता है जब इंसानियत, वीरता, राजनीति और सीमाओं से ऊपर थीं।

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