काजल जाटव। भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें आसमान छू रही हैं। कीमतों में बढ़ोतरी जनता और उद्योग दोनों के लिए परेशानी का कारण बन गई है। इन ईंधनों की कीमतों का सीधा असर हमारे ट्रांसपोर्ट सिस्टम, कृषि क्षेत्र, निर्माण कार्य, खाने-पीने की वस्तुएं और लगभग हर सेक्टर पर पड़ रहा है। जब ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है, तो सोचना स्वाभाविक है कि आखिर भारत में पेट्रोल और डीजल इतनी महंगी क्यों हो रही हैं? क्या यह केवल वैश्विक बाजार की ही देन है, या फिर सरकार की नीतियों का भी इसमें हाथ है?
मौजूदा पेट्रोल-डीजल कीमतें (जुलाई 2025):
| शहर | पेट्रोल (₹ प्रति लीटर) | डीज़ल (₹ प्रति लीटर) |
| दिल्ली | ₹103.60 | ₹94.20 |
| मुंबई | ₹109.80 | ₹97.40 |
| कोलकाता | ₹106.30 | ₹95.90 |
| चेन्नई | ₹105.20 | ₹96.00 |
| भोपाल | ₹111.10 | ₹99.30 |
| बेंगलुरु | ₹108.50 | ₹96.90 |
तेल की महंगाई के पीछे के बड़े कारण
अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमत
अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतें बहुत हद तक हमारे देश की कीमतें तय करने में अहम भूमिका निभाती हैं। भारत लगभग 85% अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए कच्चे तेल का आयात करता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ जाती हैं जैसे रूस-यूक्रेन संघर्ष या मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के कारणतो इसका सीधा असर हमारे खुदरा ईंधन की कीमतों पर दिखाई देता है।
सरकारी टैक्स – असली बोझ का कारण
अब बात करते हैं सरकारी टैक्सों की। पेट्रोल और डीजल पर दो स्तरों पर टैक्स लगता है: केंद्र सरकार एक्साइज ड्यूटी लेती है और राज्य सरकारें वैट लगाती हैं। कई शहरों में तो इन टैक्सों का हिस्सा पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमत का आधा से भी ज्यादा हो सकता है। उदाहरण के तौर पर, दिल्ली में पेट्रोल की कीमत में ₹20 से ज्यादा एक्साइज और ₹15 से भी अधिक वैट शामिल हो सकते हैं।
रुपया-डॉलर विनिमय दर
इसके साथ ही, तेल का व्यापार डॉलर में होता है। जब भारतीय रुपये की तुलना में डॉलर मजबूत हो जाता है, यानी रुपया कमजोर होता है, तो हमें तेल पर ज्यादा खर्च करना पड़ता है। जुलाई 2025 में एक डॉलर का मूल्य लगभग ₹84 के आसपास था, जिससे तेल की लागत और बढ़ गई। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने हाल ही में संसद में कहा कि पेट्रोलियम उत्पादों को GST में शामिल करना उनका अधिकार नहीं है। इस निर्णय का मुख्य कारण है कि GST परिषद में सभी राज्यों की सहमति जरूरी है। बहुत से राज्य अभी इसके लिए तैयार नहीं हैं क्योंकि इससे उनकी आय पर बड़ा असर पड़ेगा। राज्य सरकारें ही पेट्रोल और डीजल पर VAT लगाकर अक्सर अच्छी खासी कमाई करती हैं। यदि तेल को GST के तहत लाया जाए और 28% GST लागू किया जाए, तो इससे उनके राजस्व में कमी आ सकती है। यही वजह है कि अभी वे सहमत नहीं हो रहे हैं।
GST क्यों नहीं लगता पेट्रोल-डीजल पर? वित्त मंत्री का बयान
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने हाल ही में संसद में कहा, “पेट्रोलियम उत्पादों को GST में शामिल करने का फैसला केंद्र सरकार अकेले नहीं कर सकती। GST परिषद में सभी राज्य सरकारों की सहमति आवश्यक होती है। कई राज्य अभी इसके लिए तैयार नहीं हैं क्योंकि इससे उनकी राजस्व आय को बड़ा झटका लगेगा।”
राज्य सरकारें पेट्रोल और डीजल पर VAT लगाकर बड़ी कमाई करती हैं। अगर तेल को GST के तहत लाया गया और अधिकतम 28% GST लागू हुआ, तो कई राज्यों की आय पर असर पड़ेगा। यही कारण है कि वे सहमति नहीं दे रहे।
अगर GST लागू हो जाए, तो कितना सस्ता होगा तेल?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार पेट्रोल और डीज़ल पर GST लागू कर दे और मौजूदा टैक्स का ढांचा पूरी तरह से हटा दिया जाए, तो बाजार में काफी फर्क पड़ सकता है। इस कदम से, पेट्रोल की कीमत लगभग ₹25 से ₹30 प्रति लीटर तक कम हो सकती है। वहीं, डीज़ल की कीमत में भी लगभग ₹20 से ₹25 की राहत मिल सकती है। हालांकि, ये सब तभी संभव है जब केंद्र सरकार और सभी राज्य इस बात पर सहमत हों और एक साथ इसे लागू करें।
सरकार की दलील बनाम जनता की परेशानी
सरकार का कहना है कि उसने एक्साइज ड्यूटी में पहले ही कुछ राहत दी है और मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों का नियंत्रण उनके हाथ में नहीं है। लेकिन जनता का मानना है कि जब मोबाइल गेमिंग, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और खाने-पीने जैसी हर चीज पर भारी जीएसटी लग सकता है, तो पेट्रोल जैसे जरूरी पदार्थों को सस्ता बनाने के लिए क्यों कोई सार्थक कदम नहीं उठाए जा रहे हैं?
इन्हीं सब बातों पर कटाक्ष करते हुए कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने हाल ही में अपने ट्विटर अकाउंट पर एक टिप्पणी की, जिसमें उन्होंने कहा, “देश में टैक्स का बोझ जनता ही ढो रही है, जबकि सरकार का खजाना मुनाफे से भर रहा है। क्या पेट्रोल-डीजल की महंगाई ही देश का असली विकास का नक्शा बन गई है?” वहीं, आम आदमी पार्टी ने सरकार से आग्रह किया है कि पेट्रोल और डीजल को जल्दी ही GST के अंतर्गत लाया जाए, ताकि आम जनता को राहत मिल सके।
जनता की ज़मीनी हकीकत
ग्राम्य इलाकों में, जहाँ लोग ट्रैक्टर और डीजल जनरेटर पर बहुत हद तक निर्भर हैं, वहाँ डीजल की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिससे खेती और सिंचाई का खर्च और भी बढ़ गया है। वहीं, शहरी इलाकों में कैब-ड्राइवर, डिलीवरी-बॉय और ऑटो-चालक जैसी तकलीफें भी बढ़ रही हैं। मुंबई के एक टैक्सी चालक विजय चौहान कहते हैं, “हर रोज तेल के दाम चढ़ रहे हैं, पर सवारी की संख्या नहीं बढ़ रही। इस वजह से परिवार चलाना भी मुश्किल हो गया है।”
भारत में पेट्रोल-डीजल की महंगाई का कारण सिर्फ अंतरराष्ट्रीय बाजार में होने वाली परिस्थितियों से ही नहीं है, बल्कि घरेलू टैक्स नीति का भी बड़ा रोल है। जब तक केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर सही दिशा में कदम नहीं उठातीं, आम आदमी को राहत मिलना मुश्किल ही रहेगा। सरकार अगर GST को लागू करती है या टैक्स घटाती है, तो लोगों को सिर्फ बातें नहीं करनी हैं, बल्कि वास्तविक राहत भी महसूस करनी है। अब ये जिम्मेदारी सरकार और राज्यों पर है कि वे जनता की परेशानियों को समझें या फिर अपनी राजस्व की जरूरतों के नाम पर इसी तरह उलझे रहें। आने वाला समय ही बताएगा कि वे जनता की पीड़ा को समझेंगे या नहीं।
