Muskan Garg: भोपाल में आयोजित तीन दिवसीय वनमाली कथा सम्मान समारोह के दूसरे दिन साहित्य, विचार और रंगमंच का अद्भुत समागम देखने को मिला। दिन भर चले विभिन्न सत्रों ने न केवल साहित्यिक चेतना को समृद्ध किया, बल्कि विद्यार्थियों और दर्शकों को गहन संवाद और सांस्कृतिक प्रस्तुति से भी जोड़ा।
रचना पाठ: शब्दों में संवेदना का विस्तार:
समारोह के प्रथम सत्र में सम्मानित रचनाकारों का ‘रचना पाठ’ आयोजित किया गया। इस सत्र की अध्यक्षता प्रतिभा राय ने की, जबकि सान्निध्य में राजेन्द्र प्रसाद मिश्र और संतोष चौबे उपस्थित रहे।
मृदुला गर्ग ने अपने नए उपन्यास ‘वे नायाब पर्दे’ से जर्मनी केंद्रित अंश का भावपूर्ण पाठ किया। वहीं अलका सरावगी ने अपने नवीन उपन्यास ‘कलकत्ता कॉस्मोपोलिटन: दिल और दरारें’ से संवेदनात्मक अंश प्रस्तुत किया।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रतिभा राय की चर्चित कहानी ‘ट्रॉली वाली’ का हिंदी अनुवाद पाठ राजेन्द्र प्रसाद मिश्र द्वारा किया गया, जो स्वयं इसके अनुवादक भी हैं।
सत्र में बोलते हुए संतोष चौबे ने कहा कि “अच्छा पाठ वही है जो श्रोता को स्तब्ध कर दे।” उन्होंने समकालीन समय में बढ़ते अकेलेपन को साहित्य की केंद्रीय चिंता बताया और हिंदी तथा भारतीय भाषाओं की कहानियों में गहरी संवेदना की आवश्यकता पर बल दिया।
अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रतिभा राय ने स्वयं को “ह्यूमनिस्ट” बताते हुए कहा कि “लेखक न नर होता है, न नारी—वह अर्धनारीश्वर होता है।” उन्होंने साहित्य को संवेदना जगाने वाला माध्यम बताते हुए वनमाली सृजन पीठ के प्रयासों की सराहना की।
सत्र का संचालन डॉ. संगीता पाठक ने किया तथा आभार डॉ. रुचि मिश्रा तिवारी ने व्यक्त किया। ज्योति रघुवंशी द्वारा अतिथियों को प्रतीक चिन्ह एवं पुस्तकें भेंट कर सम्मानित किया गया।
डिजिटल युग में साहित्य: अंजुम शर्मा का सार्थक संवाद:
दूसरे सत्र में “डिजिटल युग में साहित्य – पाठक परिवर्तन और नई प्रासंगिकताएं” विषय पर लेखक अंजुम शर्मा ने विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों से संवाद किया। इस अवसर पर लीलाधर मंडलोई और संतोष चौबे का विशेष सान्निध्य रहा तथा संचालन विकास अवस्थी ने किया।
अंजुम शर्मा ने साक्षात्कार प्रक्रिया, निष्पक्ष प्रश्नों की महत्ता और साहित्यकार की गरिमा बनाए रखने की आवश्यकता पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि डिजिटल माध्यम बदल सकते हैं, किंतु साहित्य की मूल संवेदनाएं स्थायी रहती हैं। कई बार ‘रॉ’ और सहज संवाद ही पाठकों को अधिक प्रामाणिक लगते हैं।
रंग-संगीत से सजी सांस्कृतिक संध्या:
तीसरे सत्र में टैगोर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय) के विद्यार्थियों ने रंग-संगीत की मनोहारी प्रस्तुति दी।
नाट्य गीतों जैसे “बहुत सुंदर लगेगा सूर्य”, “ज्ञान नहीं हो सकता बंदी” और “पानी नहीं है गांव में” ने सामाजिक सरोकारों को जीवंत किया। साहित्यिक काव्य प्रस्तुति में सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की “वो तोड़ती पत्थर”, नागार्जुन की “चंद मैंने सपना देखा” तथा कुंवर नारायण और संतोष चौबे की कविताओं का सशक्त मंचन हुआ।
अंत में पारंपरिक होली गीतों की प्रस्तुति ने वातावरण को उत्सवधर्मी रंगों से भर दिया।
“मगर शेक्सपियर को याद रखना” — कला और मानवीय द्वंद्व की संवेदनात्मक कथा:
समारोह के अंतिम सत्र में रंगशीर्ष नाट्य समूह द्वारा संतोष चौबे की चर्चित कहानी “मगर शेक्सपियर को याद रखना” का प्रभावशाली मंचन किया गया जिसका निर्देशन संजय मेहता ने किया।
नाटक की कथा कार्तिक और वरिष्ठ नाट्यकर्मी इरफान अहमद साहब के संबंधों के माध्यम से कला, अहं और मानवीय संवेदनाओं के द्वंद्व को उजागर करती है। प्रस्तुति में William Shakespeare के नाटक A Midsummer Night’s Dream के मंचन को भी कथानक का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया।
कलाकारों में रूपेश तिवारी (कार्तिक), संजय मेहता (इरफान अहमद), शमा खान, चित्रांश कुमार, मोहम्मद फैजान, अंकिता पाल, गायत्री निगम सहित अनेक कलाकारों ने प्रभावशाली अभिनय किया। प्रकाश परिकल्पना कमलेश वर्मा, संगीत संयोजन संजय मेहता तथा समन्वयन विक्रांत भट्ट द्वारा किया गया।
नाटक का संदेश स्पष्ट था—व्यक्तिगत कटुताओं से ऊपर उठकर कला और उसकी सृजनात्मकता को याद रखा जाना चाहिए।
वनमाली कथा सम्मान समारोह का दूसरा दिन साहित्यिक संवेदना, वैचारिक संवाद और रंगमंचीय अभिव्यक्ति का जीवंत उदाहरण बनकर उभरा। यह आयोजन न केवल साहित्य को नई पीढ़ी से जोड़ने का माध्यम बना, बल्कि यह भी दर्शाया कि बदलते समय में भी शब्द, संवाद और कला की शक्ति कई अधिक है।
