Deepali Yaduwanshi: मुंबई में 4 जुलाई को एक ऐतिहासिक दृश्य देखने को मिला जब शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) प्रमुख उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) प्रमुख राज ठाकरे 20 वर्षों बाद एक ही मंच पर दिखाई दिए। यह रैली ‘आवाज़ मराठीचा’ के नाम से आयोजित की गई थी, जिसका उद्देश्य राज्य में मराठी भाषा की गरिमा को बनाए रखना और उस पर हो रहे राजनीतिक प्रशासनिक हमलों का विरोध करना था।
इस रैली की सबसे बड़ी वजह राज्य सरकार द्वारा सभी स्कूलों में हिंदी को तीसरी भाषा के रूप में अनिवार्य किए जाने की प्रस्तावना थी, जिसे मराठी संगठनों और आम लोगों द्वारा मराठी अस्मिता के खिलाफ बताया गया। जनभावनाओं को देखते हुए सरकार को यह प्रस्ताव वापस लेना पड़ा।
राज–उद्धव की एकता का संदेश
राज और उद्धव ठाकरे दोनों ही भाषणों में बेहद भावुक और आक्रामक नजर आए। उद्धव ठाकरे ने कहा कि अब वक्त आ गया है कि हम अपनी मातृभाषा को बचाने के लिए एक साथ खड़े हों। वहीं राज ठाकरे ने सीधे तौर पर केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि “हम महाराष्ट्र में किसी और भाषा को नहीं थोपने देंगे।”
दोनों नेताओं की यह एकजुटता न केवल राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बनी, बल्कि आम जनता को भी यह उम्मीद जगी कि मराठी भाषा और संस्कृति की रक्षा के लिए अब कोई ठोस कदम उठाया जाएगा। लंबे समय से राजनीतिक रूप से अलग राह चलने वाले इन दोनों नेताओं का यह साथ आना ऐतिहासिक माना जा रहा है।
रैली की प्रमुख बातें
रैली मुंबई के वर्ली इलाके में हुई और इसमें हजारों की संख्या में मराठी भाषी नागरिकों ने भाग लिया।मंच से यह भी ऐलान किया गया कि भविष्य में मराठी भाषा को शिक्षा, प्रशासन और सरकारी नौकरियों में प्राथमिकता देने की मांग को मजबूती से उठाया जाएगा।नेताओं ने कहा कि मराठी केवल भाषा नहीं, महाराष्ट्र की आत्मा है और इस आत्मा पर कोई समझौता नहीं होगा।
सरकार की प्रतिक्रिया
उप- मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने कहा कि सरकार ने जनभावनाओं का सम्मान करते हुए हिंदी को तीसरी अनिवार्य भाषा बनाने का निर्णय वापस ले लिया है। उन्होंने यह भी कहा कि महाराष्ट्र में सभी भाषाओं का सम्मान किया जाएगा, लेकिन मराठी की प्राथमिकता बनी रहेगी।
यह रैली केवल एक भाषाई मुद्दे तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह महाराष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान और भाषाई आत्मसम्मान की पुनःस्थापना का प्रतीक बन गई। राज और उद्धव ठाकरे की एकजुटता ने यह संदेश दे दिया है कि जब बात मराठी अस्मिता की हो, तब राजनीतिक मतभेद भी पीछे छूट जाते हैं। यह घटनाक्रम आने वाले दिनों में राज्य की राजनीति और भाषायी नीतियों को नए सिरे से परिभाषित कर सकता है।
राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे (फोटो:X) 