Muskan Garg: भारत का केंद्रीय बजट केवल सरकारी आय-व्यय का लेखा-जोखा नहीं होता, बल्कि यह तय करता है कि एक आम नागरिक की थाली में क्या होगा, बच्चों की पढ़ाई कैसी होगी और भविष्य के सपने कितने पूरे हो पाएंगे। 1860 में पेश हुए पहले बजट से लेकर आज के डिजिटल इंडिया तक, बजट ने हर दौर में देश की दिशा और दशा को प्रभावित किया है।

1860: जब बजट बना अंग्रेजी शासन का औज़ार:
भारत का पहला बजट जेम्स विल्सन ने 1860 में पेश किया था। इसका मकसद भारतीय जनता का कल्याण नहीं, बल्कि ब्रिटिश शासन के खर्च पूरे करना था। नमक कर, भूमि राजस्व और आयात-निर्यात शुल्क जैसे करों ने आम आदमी की थाली को महंगा कर दिया। शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च बेहद सीमित था, जिससे आम परिवारों के बच्चों के लिए पढ़ाई एक सपना बनी रही।

आज़ादी के बाद: थाली और तालीम पर फोकस:
1947 के बाद बजट का स्वरूप बदला। सरकार ने खाद्य सुरक्षा, सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) और शिक्षा के विस्तार पर ज़ोर दिया। हरित क्रांति के लिए बजटीय प्रावधानों ने अनाज उत्पादन बढ़ाया, जिससे थाली में रोटी सुलभ हुई। वहीं, स्कूल-कॉलेजों के लिए फंड बढ़ने से बच्चों की पढ़ाई आम लोगों तक पहुंचने लगी।

शिक्षा और पोषण: बजट की दो मज़बूत कड़ियाँ:
मिड-डे मील योजना हो या सर्व शिक्षा अभियान इन सबके पीछे बजट की ताकत है। सही बजट आवंटन बच्चों को पोषण और शिक्षा दोनों देता है। जब शिक्षा बजट बढ़ता है, तो स्कूलों की संख्या, छात्रवृत्तियाँ और डिजिटल लर्निंग के अवसर बढ़ते हैं। वहीं, खाद्य सब्सिडी घटने पर सबसे पहले असर गरीब की थाली पर पड़ता है।

उदारीकरण से डिजिटल भारत तक:
1991 के आर्थिक सुधारों के बाद बजट ने निजीकरण और उदारीकरण को बढ़ावा दिया। इससे रोज़गार के नए अवसर बने और आमदनी बढ़ी। 2014 के बाद डिजिटल इंडिया, स्टार्ट-अप इंडिया और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) जैसे कार्यक्रमों के लिए बजट ने तकनीक को केंद्र में रखा। आज बच्चों की पढ़ाई मोबाइल, टैबलेट और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तक पहुंच चुकी है, और यह सब बजट की प्राथमिकताओं का नतीजा है।

आम आदमी पर सीधा असर:
महंगाई भत्ता, टैक्स स्लैब, शिक्षा लोन पर ब्याज, राशन की कीमत, ये सब बजट तय करता है। एक छोटा सा बदलाव पूरे परिवार की आर्थिक योजना बदल सकता है।

1860 से लेकर डिजिटल भारत तक बजट ने सिर्फ़ सरकार की नहीं, बल्कि हर घर की कहानी लिखी है। थाली में दाल-रोटी से लेकर बच्चों के हाथ में किताब या टैबलेट सब कुछ किसी न किसी रूप में बजट से जुड़ा है। इसलिए बजट को समझना सिर्फ़ अर्थशास्त्र नहीं, बल्कि अपनी ज़िंदगी को समझना है।

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